सिर्फ पुस्तकों की भाषा न बने हिन्दी


हिन्दी को लोकभाषा बनने के लिए इसमें अन्य स्थानीय भाषाओँ को समाहित करना भी आवश्यक है नहीं तो हिन्दी मात्र पुस्तको की भाषा बनकर रह जाएगी। इस बात की जरुरत बहुत समय से महसूस की जा रही है क्योंकि जो प्रवाह, प्रसार और प्रचार हिन्दी का होना चाहिए वो नहीं हो पा रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक ख़ास पहचान बनाई है। हिन्दी भाषा का लचीलापन इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत है।इसमें हमेशा नए प्रयोगों की गुंजाइश रहती जिसके कारण ये रोज़ समृद्ध होती है। हिन्दी ने हमेशा अन्य भाषाओं का स्वागत किया है और उन्हें खुद में समाहित भी किया है चाहे वह अंग्रेज़ी हो या उर्दू।पर स्थानीय भाषाओँ जैसे ब्रज,मैथिली, मगही, भोजपुरी को भी हिन्दी भाषा में शामिल करना होगा क्योंकि हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोग आज भी स्थानीय भाषाओँ को बोलना ही पसंद करते हैं।

मौजूदा समय में हिन्दी को जनमानस की भाषा बनाने में युवा पीढ़ी का बहुत बड़ा योगदान है। सोशल मीडिया पर भी हिन्दी के बहुत सारे एप्लीकेशन मौजूद हैं जिनका भरपूर उपयोग युवा वर्ग द्वारा किया जा रहा है। युवा वर्ग का हिन्दी के प्रति बढ़ता लगाव इसके उत्कृष्ट भविष्य की संभावनाएं तो जगाता है पर इसका दायरा सीमित ही है।

जहाँ तक हिन्दी साहित्य का प्रश्न है तो आज भी वहाँ एक विशेष तरह की हिन्दी का प्रचलन है जिसे हिन्दी के विद्वानों ने अपनी मोनोपोली बनाये रखने के लिए विकसित किया है।आम आदमी का इस व्यवस्था में दख़ल देना बहुत मुश्किल है। हिन्दी के बेहतर भविष्य के लिये इसे बदलने की जरुरत है। जिसके प्रयास अगर नहीं किये गए तो हिन्दी सिर्फ पुस्तको की भाषा  रहेगी पर हिन्दी साहित्य के लोकप्रिय होने की संभावना शिथिल हो जाएगी। आम लोगो द्वारा बोले जाने वाली हिन्दी का भी साहित्य में प्रवेश आवश्यक है जिसके लिए अन्य स्थानीय और लोकप्रिय भाषाओं को भी हिन्दी में स्थान देना होगा।आम लोगो को हिन्दी पढ़ते समय ये न लगे कि वह कोई शोध-पत्र पढ़ रहा हैं। भाषा ऐसी होनी चाहिए जिससे लोग खुद को जुड़ा महसूस करें।

राजनैतिक ईच्छाशक्ति के बिना हिन्दी को वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित करना असंभव है। सरकार को हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए हरसंभव प्रयास करने की आवश्यकता है। जिसकी अभी तक कमी ही रही है। सरकारी दफ्तरों, न्यायालयो और उच्च शिक्षा में हिन्दी का प्रचलन बढ़ाने के लिए कोई भी सरकार अब तक गंभीर नहीं दिखी है।

बहुत से युवा अंग्रेजी भाषा का कम ज्ञान होने और हिन्दी में उच्च शिक्षा की पुस्तकें उपलब्ध न होने के कारण मनचाहा विषय नहीं चुन पाते हैं जिसपर सरकार को ध्यान देने की जरुरत है।

अश्वनी राघव

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