निराश होते संविदाकर्मी

नेशनल एड्स कण्ट्रोल प्रोग्राम, नेशनल हेल्थ मिशन और टीबी उन्मूलन कार्यक्रम जैसी केंद्रीय स्वास्थ्य परियोजनाओं में कार्यरत लाखों संविदाकर्मियों में  हताशा का माहौल है।सरकार द्वारा लगातार इनके हितों की अनदेखी की जा रही है।

सातवें वेतन आयोग के बाद इनके समान पद पर कार्यरत नियमित कर्मचारी का वेतन इनसे चार गुना हो गया है और ये लोग नाममात्र के वेतन पर जैसे-तैसे अपना गुज़र-बसर करने को मजबूर हैं। स्थिति ये है कि एक ही केंद्र में कार्य करने वाला नियमित सफाईकर्मी एक पोस्ट-ग्रेजुएट संविदाकर्मी से लगभग दोगुना वेतन ले रहा है।ऐसा नहीं है कि ये अन्तर केवल नियमित और संविदाकर्मियों के मध्य ही है। अलग अलग परियोजनाओं में समान पद पर कार्य कर रहे कर्मचारियों के वेतन में भी एक बड़ा अन्तर है और तो और एक ही परियोजना में समान पद पर कार्य कर रहे कर्मचारी भी अलग-अलग वेतन पा रहे हैं।उदाहरण के लिए नेशनल एड्स कण्ट्रोल कार्यक्रम के राष्ट्रीय कार्यालय में संविदा पर कार्य कर रहे वाहन-चालक का वेतन राज्य के कार्यालय में कार्य कर रहे वाहन-चालक से ज्यादा है।कर्मचारी संगठन बार बार इस अन्तर को समाप्त करके शिक्षा, अनुभव और किये जाने वाले कार्य के आधार पर वेतन निर्धारित करने की माँग करते रहते हैं।

एड्स, टीबी और अन्य जानलेवा बीमारियों से लोगो को बचाते ये कर्मचारी अक़्सर संक्रमण का शिकार हो जाते हैं पर हैरत की बात है कि सरकार द्वारा इन्हें कोई चिकित्सा सुरक्षा और अन्य सुविधाएं नहीं दी जातीं। आकस्मिक जरुरत के समय में भी ये कर्मी अपनी सेवाएं पूरी ईमानदारी से देने में पीछे नहीं हटते चाहे वो डेंगू, चिकनगुनिया की महामारी हो या फिर कोई अन्य लोकहित का कार्य ये कर्मी पूरी मुस्तैदी से डटे रहते हैं। फिर भी न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारें इनकी सुध लेती हैं।परिवार का पेट भरने की जद्दोजहद में दिन रात लगे ये कर्मी बढ़ती महंगाई के चलते अपने और अपने परिवार का ईलाज करवा पाने में खुद को लाचार पाते है ऐसी स्थिति में अक़सर साथी कर्मचारी मिलकर अपने पीड़ित सहकर्मी की आर्थिक मदद करते हैं। नियोक्ता द्वारा उन्हें कोई मदद नहीं दी जाती।

बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद इनके ऊपर नौकरी जाने का ख़तरा हमेशा बना रहता है। उच्च अधिकारियों का व्यवहार भी इन संविदाकर्मियों के साथ मानवीय नहीं होता।बात बात पर इन्हें नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है।हर वर्ष कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू होंने की जरुरत इन कर्मियों को उच्च अधिकारियों का मनमाना रवैया सहने को मजबूर करती है। वर्षों से इन परियोजनाओं में कार्य कर रहे इन शिक्षित और अनुभवी कर्मियों को हर वर्ष अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए मजबूर होना पड़ता है जिसका फ़ायदा अधिकारी अपने निजी लाभ के लिए उठाते हैं।

फण्ड की कमीं का रोना रोकर ये संस्थान हमेशा संविदाकर्मियों का ही शोषण करते हैं वो अलग बात है कि इनकी  अनावश्यक बैठको और यात्राओं के लिए कभी धन की कमी नहीं पड़ती। कर्मियों की जायज़ माँगों के जवाब में उन्हें बस टाल दिया जाता है और कमेटी बनाने का कोरा आश्वासन दे दिया जाता है जिसका कोई भी परिणाम आज तक नहीं निकला। जब सरकारी परियोजनाओं में  कार्य कर रहे संगठित कर्मचारियों की ये हालत है तो असंगठित क्षेत्रों में कार्य कर रहे कर्मियों की स्थिति का अंदाज़ा स्वतः ही लगाया जा सकता है।

कॉन्ट्रैक्ट कर्मियों के लिए  नीति के अभाव में सरकार इनकी जायज़ माँगों को टालती रहती हैं।अपनी जायज़ माँगों को लेकर दर-दर भटकते इन कर्मचारियों को राज्य सरकारे भी चुनावी वादों तक ही याद रखती हैं। 

कई न्यायालयों ने इनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए इन्हें भी समान पद के लिये समान वेतन का अधिकारी माना है और कहा है कि संविदा पर केवल “आप एक या दो वर्ष तक ही काम करा सकते हैं और बीसियों वर्षो से लगातार अपनी सेवाएं दे रहे इन कर्मियों को नियमित कर्मियों के समान सुविधाएं दी जानी चाहियें।”फिर भी सरकार ने इनके लिये कोई सकारात्मक क़दम उठाना जरुरी नहीं समझा। 

वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे ये संविदाकर्मी अब निराश हो चुके हैं। इन्हें अपने “अच्छे दिन “आने की कोई आस नज़र नहीं आ रही। 

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5 thoughts on “निराश होते संविदाकर्मी

  1. सरकार की इस दोहरी नीति से HIV कर्मचारी का भविष्य ख़राब हो रहा है।

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      1. अनुबंध पर कार्यरत कर्मचारी को यदि बंधुआ मजदूर भी कहा जाये तो अतिसयोक्ति नही होगी , बंधुआ इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि इस अनुबंध में दी गयी शर्तो से लगता है , की जैसे सरकार कर्मचारी न रखकर कोई गुलाम रख रही हो ,
        आज भारत का ये बड़ा और शिक्षित युवा वर्ग अपने आप को उपेक्षित / ठगा सा महशूस कर रहा है , क्या इन संविंदा वर्ग के लिए कोई ठोस नीति नही होनी चाहिए , क्या इन संविंदा वालो का भविष्य के लिए कोई नीति नही होनी चाइये , संविंदा को कोई अभिशाप कहा जाए तो गलत न होगा , शायद ही कोई संविंदा कर्मी ऐसा हो जो इस संविंदा के साथ कार्य में अपना भविष्य सुरक्षित समझता होगा

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  2. अनुबंध पर कार्यरत कर्मचारी को यदि बंधुआ मजदूर भी कहा जाये तो अतिसयोक्ति नही होगी , बंधुआ इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि इस अनुबंध में दी गयी शर्तो से लगता है , की जैसे सरकार कर्मचारी न रखकर कोई गुलाम रख रही हो ,
    आज भारत का ये बड़ा और शिक्षित युवा वर्ग अपने आप को उपेक्षित / ठगा सा महशूस कर रहा है , क्या इन संविंदा वर्ग के लिए कोई ठोस नीति नही होनी चाहिए , क्या इन संविंदा वालो का भविष्य के लिए कोई नीति नही होनी चाइये , संविंदा को कोई अभिशाप कहा जाए तो गलत न होगा , शायद ही कोई संविंदा कर्मी ऐसा हो जो इस संविंदा के साथ कार्य में अपना भविष्य सुरक्षित समझता होगा

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