कुपोषित भारत


कुपोषित भारत

कुछ दिनों पहले वाशिंगटन स्थित इंटरनेशनल फ़ूड पालिसी एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार भुखमरी में मामले में भारत की स्थिति काफी शर्मिंदा करने वाली है।118 देशो वाली इस सूची में भारत का स्थान 97वां है। भारत की ज्यादा अच्छी स्थिति नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका की है।

भारत में लगभग पंद्रह प्रतिशत लोगो को भरपेट खाना नसीब नहीं होता वहीँ दूसरी ओर पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों में लगभग चालीस प्रतिशत कुपोषित हैं।भारत में हर साल लगभग तेरह लाख बच्चे पाँच वर्ष की उम्र से पहले ही मर जाते हैं जिसमे से आधे कुपोषण के शिकार होते हैं।और जो बच्चे कुपोषण के वार से बच जाते हैं उन्हें तमाम उम्र परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। 

कुपोषण का सीधा सम्बन्ध किसी भी देश के विकास से है अगर बच्चे कुपोषित होंगे तो उनका विकास सामान्य नहीं होगा और शारीरिक और मानसिक तौर पर वो स्वस्थ व्यक्ति से कमतर प्रदर्शन करेंगे।इतनी बड़ी संख्या में कुपोषित नागरिक किसी भी देश की अर्थव्यवस्था और विकास को बाधित करेंगे।

बिल गेट्स ने कहा है कि अगर उनके हाथ में कोई जादू की छड़ी होती तो सबसे पहले वो कुपोषण को समाप्त करते क्योंकि कुपोषण गरीब लोगो को और गरीब और कमजोर लोगो को और कमजोर बनाता है साथ ही उनके विकास के अवसरों को भी कम करता है।

एक अनुमान के अनुसार स्वस्थ लोगो की तुलना में कुपोषित लोगो द्वारा की जाने वाली कमाई लगभग एक-चौथाई ही रहती है जिसके चलते भारत की अर्थव्यवस्था को 2030 तक 46 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ेगा।कई देशो ने इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए कुपोषण उन्मूलन को अपने राष्ट्रीय एजेंडे में स्थान दिया और इसके नियंत्रण में सफलता भी पाई है जिसका एक उदाहरण ब्राज़ील है। भारत में ऐसी राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है कोई भी सरकार अभी तक इसे रोकने में सफल नहीं हुई है।सुदूर ग्रामीण इलाको में तो अभी तक कोई सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएँ भी नहीं पहुँच पाईं हैं।

भुखमरी, कुपोषण और गरीबी आज भी भारत की कड़वी सच्चाई है जिसे सभी सरकारे मानने से ऐतराज़ करती आई हैं।गरीबी उन्मूलन के नारों से शुरू हुई योजनाएं केवल गरीबो को जिन्दा रखे हुए हैं विकास की तो बात बहुत दूर की बात है।

भारत दो भागों में बंट गया है मजबूत और कमजोर।और सरकारे केवल मजबूत और समृद्ध भारत की तस्वीर ही दुनिया को दिखाती आई हैं।सारी योजनाएं भी समृद्ध लोगो को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।गरीबो को बस उतना ही नसीब है जितना उनको जिन्दा रहने के लिए जरुरी है।

अश्वनी राघव

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