दिल्ली सरकार के पास भी हों अधिकार……

दिल्ली सरकार के पास भी हों अधिकार

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माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि दिल्ली सरकार के पास भी कुछ अधिकार होने चाहिएं अन्यथा वह कार्य नहीं कर सकेगी।शीर्ष न्यायालय ने ये टिप्पणी उच्च न्यायालय के उस फैसले के विरोध में दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार द्वारा दायर अपील की सुनवाई के दौरान की, जिसमे उपराज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक प्रमुख बताया गया था।

जस्टिस अर्जन कुमार सीकरी और अभय मनोहर सप्रे की बेंच ने कहा कि दिल्ली सरकार के पास भी कुछ अधिकार होने चाहिए अन्यथा वह कार्य नहीं कर पाएगी। ये टिप्पणी माननीय सर्वोच्च न्यायालय की लोकतंत्र और लोक-कल्याण के लिए किये जाने वाले प्रयासों के प्रति संवेदनशीलता को प्रतिबिंबित करती है।जाहिर है कि ये टिप्पणी स्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर ही की गई है।

उच्च न्यायालय के फैसले के बाद जिसमे उपराज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक प्रमुख बताया गया था, दिल्ली के नागरिको की अपेक्षाओं और आप सरकार की निर्णय लेने के अधिकारो पर एक प्रश्न-चिन्ह लग गया था।

आज की परिस्थिति में दिल्ली सरकार को अपने लिये किसी अधिकारी को नियुक्त करने या स्थानांतरण करने का भी अधिकार नहीं है चाहे वह चतुर्थ श्रेणी का ही कर्मचारी क्यों न हो। उच्च न्यायालय के उक्त फैसले के बाद अधिकारी भी सरकार द्वारा लिए गए लोक-कल्याण के निर्णयों के किर्यान्वयन में कोताही बरत रहे हैं जिससे सबसे ज्यादा नुकसान दिल्ली की जनता का हो रहा है।विडम्बना ये है कि दिल्ली सरकार से ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने के अधिकार भी छीन लिए गए हैं।

राजनैतिक कारणों से पैदा की गई इस अवरोध की स्थिति से आप सरकार द्वारा लिए गए लगभग चार सौ फैसले भी खटाई में पड़ गए हैं जिनका उद्देश्य मात्र जनता को फायदा पहुँचाना था जिनमे बिजली कटौती से परेशान उपभोक्ताओं को मुआवजा देना, अल्पकालिक शिक्षको का नियमतिकरण,किसानो को प्रति एकड़ मिलने वाली चौवन लाख की राशि को बढ़ाकर बाजार भाव  के अनुसार तीन करोड़ करना, मिड-डे मील योजना के तहत लगभग पंद्रह लाख बच्चों को फायदा पहुँचाने के लिए अक्षय-पात्र संगठन को कार्य देना, दिल्ली सरकार में तैनात केंद्र के कर्मचारियों द्वारा की जानी वाली गड़बड़ियों के खिलाफ कार्यवाही किये जाने के  फैसले भी शामिल हैं।

दिल्ली सरकार के मंत्री हर लिए गए निर्णय को मंजूर करवाने के लिए यहाँ से वहाँ दौड़ने को मजबूर हैं। क्या ये लोकतंत्र और दिल्ली के नागरिको के साथ मज़ाक नहीं है? जनता सरकार चुनती है ताकि वो उनकी भलाई के लिए कार्य कर सके पर राजनैतिक ईर्ष्या और वोटबैंक की राजनीति के चलते किसी चुनी गई सरकार के कार्यो में बाधा पहुँचाना लोकतंत्र और जनता की भावनाओं का अपमान है।

केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल की सलाह मानने के लिये जब महामहिम राष्ट्रपति बाध्य हैं तो दिल्ली में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं है? अगर हमारे कानून और व्यवस्था में चुनी हुई सरकार को अपंग बनाने वाले नियम हैं तो ऐसे नियमो को तुरंत बदलने की जरुरत है।सभी नियमो का केंद्र जनता का लाभ होना चाहिए न की राजनैतिक स्वार्थ।

अश्वनी राघव

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