जल्लीकट्टू पर सियासत..

जल्लीकट्टू पर सियासत

पोंगल के अवसर पर तमिलनाड़ु में खेला जाने वाला पारंपरिक “जल्लीकट्टू” खेल आजकल चर्चा के केंद्र में है। जल्लीकट्टू लगभग चार सौ वर्षो से तमिलनाडु की संस्कृति का हिस्सा है। इस खेल में सांडो को लोगो के बीच छोड़ दिया जाता है जिसपर भाग ले रहे लोग काबू पाने की कोशिश करते हैं। 

जहाँ एक ओर खेल के समर्थक कहते हैं कि इस खेल में उनका जानवरो के प्रति लगाव प्रदर्शित होता है वहीँ इसके विरोधी इस खेल को जानवरो पर हो रहा अत्याचार बताते हैं।गौरतलब है कि हरवर्ष इस खेल के दौरान कई व्यक्ति जख्मी हो जाते हैं और पिछले दस वर्षो के दरम्यान लगभग दो सौ लोग इसमें अपनी जान भी गँवा चुके हैं।

वर्ष 2014 में सर्वोच्च अदालत ने इस खेल को जानवरो के प्रति क्रूरता मानते हुए इस खेल पर रोक लगा दी थी पर केंद्र सरकार ने आठ जनवरी को अधिसूचना जारी कर इस पर लगी रोक को खत्म कर दिया।जिसके विरोध में कुछ पशु-प्रेमी संस्थाओ ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए इस पर दोबारा रोक लगाने की अपील की।अदालत ने भी इस पर रोक जारी रखते हुए इस पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

रोक के विरोध में तमिलनाडु में जगह-जगह धरना प्रदर्शन हो रहे हैं।सभी राजनैतिक पार्टियां भी इस रोक के विरोध में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं। दुकान-ऑफिस, स्कूल-कॉलेज सब बंद हैं।कमल हसन,रजनीकान्त और भी कई बड़ी हस्तियां खुल कर जल्लीकट्टू के समर्थन में आ गए हैं।

ये देश का दुर्भाग्य है कि  राजनीतिक पार्टियाँ केवल अपने वोटबैंक के आधार को बढ़ाने के लिए जनता की भावनाओं का दोहन करते हैं।इस मुद्दे पर भी यही हुआ सभी राजनीतिक दल इस मुद्दे का तार्किक हल ढूंढ़ने की कोशिश करने की बजाए खुद को जल्लीकट्टू का बड़ा समर्थक साबित करने में लगे हैं।

केंद्र सरकार ने भी तमिलनाडु सरकार द्वारा लाये गए अध्यादेश को मंजूरी देकर इसपर लगी रोक को हटा दिया। इसी बीच धर्म-गुरु रविशंकर ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा कि जल्लीकट्टू होली- दीवाली से भी बड़ा त्यौहार है वो अलग बात है कि आजकल धर्मगुरुओं की राजनीतिक निष्पक्षता संदेह में ही रहती है। पर हैरत की बात ये है कि मेनका गाँधी का कोई भी बयान इस बीच नहीं आया।बड़े पैमाने पर हुए धरना-प्रदर्शन में कुछ पेच भी है जहाँ एक ओर कई नेता इस विरोध से खुद को बड़ा और लोगो से जुड़ा नेता साबित करने में लगे हैं वहीँ दूसरी और जयललिता की संदेहास्पद मृत्यु को लोगो ने भुला दिया है।

पशु-प्रेमी संस्थाओ ने अपनी याचिका में कहा था कि इस खेल में सांडो को शराब पिलाई जाती है और उनके शरीर को तरह-तरह की यातना देकर आक्रामक बनाया जाता है। जिससे एक तरफ तो जानवरो को पीड़ा पहुँचती है दूसरी और कई व्यक्ति भी अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। सरकार को इसका तार्किक हल ढूँढ़ते हुए पशुओं के साथ हो रही सभी यातनाओं को रोकना चाहिए था और आवश्यक बदलाव करके इसे सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से आयोजित करने के निर्देश देने चाहिए थे। परम्परा में भी समयानुसार बदलाव जरुरी हैं जो कि सभ्यता के विकास का परिचायक भी है।

शीर्ष अदालत के फैसले को बदलकर शुरू की गई ये परम्परा निःसंदेह भविष्य के लिये अच्छा संकेत नहीं है। न्यायपालिका और विधायिका को परस्पर सम्मान दिखाते हुए बीच का कोई रास्ता निकालना चाहिए जिसमे पशु भी प्रताड़ित न हों और लोगो की भावनाओं का भी ख्याल रखा जा सके।

अश्वनी राघव

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