संस्कृति के नाम पर गुंडई

संस्कृति के नाम पर गुंडई..

इस साल भी वैलेंटाइन डे से पहले बजरंग दल की धमकी आ गई कि वैलेंटाइन डे पर जो युवक-युवतियां पार्क या मॉल में साथ बैठे मिलेंगे उन्हें बजरंग दल के कार्यकर्ता उनके माता-पिता के सामने ले जाएँगे और उनकी जबरदस्ती शादी करवाएंगे।बजरंग दल हर साल ऐसी चेतावनी देता आया है।मीडिया में भी युवक-युवतियों के साथ गुंडई करते इनके कार्यकर्ताओं की तस्वीरें आती रहती हैं।

नैतिकता के ये स्वघोषित ठेकेदार राजनितिक सरंक्षण के चलते क़ानून की सरे-आम धज्जियां उड़ाते हैं और सरकार और पुलिस मूक दर्शक बनी रहती है।युवा-वर्ग अब इनके ख़िलाफ़ आवाज़ भी उठाने लगा है।पर प्रश्न ये है कि नागरिको की निज़ता और सम्मान को छीनने का हक़ इन्हें किसने दिया और क्यों इनके ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्यवाही नहीं की जाती??

ऐसा नहीं है कि इन कट्टरवादी संगठनो को नियंत्रित करने की माँग बुद्धिजीवी वर्ग और राजनीतिक दलों ने नहीं उठाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का  मध्यममार्गी संगठन हिन्दू महासभा भी इनमे शामिल है पर नतीजा शिफ़र ही निकला।यहाँ तक कि पूर्व  प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने भी इस संगठन की गतिविधियों पर आपत्ति उठाई थी।

भारतीय संस्कृति को बचाने के नाम पर अपनी दूकान चला रहे इन कट्टरपंथी संगठनो को शायद ये नहीं मालूम कि हमारी संस्कृति में प्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।राधा-कृष्ण, गंगा-शान्तनु, अर्जुन-उलूपी, भीम-हिडिम्बा, कृष्ण-शुभद्रा आदि कई उदाहरण हमारे धार्मिक ग्रंथो में मौजूद हैं जो प्रेम-भावनाओं का बखान करते हैं। हज़ारो वर्ष पहले भी महिलाओं को स्वयंवर के माध्यम से अपना जीवनसाथी चुनने की व्यवस्था हमारी परम्परा में रही है। प्रेमी-प्रेमिका की आपसी रज़ामंदी से गन्धर्व-विवाह करने की आज़ादी थी जिसके कई किस्से हमारी लोककथाओं में शामिल भी हैं।

आजकल हर क्षेत्र में महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर पुरुषो के साथ चल रही हैं चाहे वह शिक्षा हो या रोज़गार ऐसे में अपने सहपाठी या सहकर्मी के प्रति आकर्षित होना प्राकृतिक है और उसकी निजी स्वतंत्रता भी।हमारा संविधान भी किसी व्यक्ति या संगठन को नागरिकों की निजी भावनाओँ में दखलंदाज़ी का अधिकार नहीं देता।

पुरुषवादी मानसिकता के चलते ऐसे संगठन महिलाओं की आज़ादी को पचा नहीं पा रहे हैं और कट्टरवादी सोच को बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं।ऐसी मानसिकता के कारण ही  दहेज़,हॉनर किलिंग, घरेलू हिंसा आदि सामाजिक कुरीतियों को बढ़ावा मिलता है।

हमारे देश में लगभग पचास फीसदी बच्चे अपने ही परिवारजनो द्वारा किये जाने वाले यौन शोषण का शिकार होते हैं और जहाँ महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा आम बात है वहाँ महिलाओं के लिये शिक्षा और रोज़गार की बात होनी चाहिए न कि उन्हें डरा धमकाकर पुरुषवादी मानसिकता के सामने नतमस्तक करने की।

सरकार, प्रशासन, मीडिया, पुलिस, सामाजिक संगठनो, बुद्धिजीवी वर्गों और सभी  नागरिको का ये दायित्व बनता है कि ऐसे संगठनो का विरोध करें जिससे महिलाएं भी इक्कीसवीं सदी के इस भारत में अपना सर उठाकर चल सकें और किसी को उनकी निजी स्वतंत्रता और भावनाओं को दबाने का मौका न मिल सके।

अश्वनी राघव

Advertisements

One thought on “संस्कृति के नाम पर गुंडई

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s