जुमलों का जनतंत्र

जुमलों का जनतंत्र

पाँच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावो में जुमलेबाजी का दौर अपने चरम पर है।तरह तरह के प्रलोभन नेताओं और राजनीतिक दलों द्वारा दिए जा रहे हैं।देश का दुर्भाग्य ही है कि राजनीतिक जागरूकता के इस दौर में भी मतदाता इन चुनावी जुमलों पर विश्वास कर लेता है चाहे उसके पीछे उसकी मज़बूरी या लालच ही हो।दुःख की बात ये है कि कई लोग इन जुमलों की असलियत जानने के बावजूद भी किसी राजनीतिक दल या नेता की अंधभक्ति में अपना मत ऐसे नेताओ को दे देते हैं जो जनता को बेवकूफ बनाने का काम बड़ी चतुरता से कर रहे हैं।

हालिया हो रहे विधानसभा चुनावों में तरह तरह के वायदे राजनीतिक दलों ने किये जिसमे उत्तरप्रदेश में पचास लाख रोजगार का सृजन,हर गाँव में बिजली की सुविधा और किसानो की कर्जमाफी प्रमुख हैं।कई गंभीर मुद्दों को सभी दलों ने नज़रअंदाज़ किया है जिनमे कुपोषण, संविदाकर्मियों के मुद्दे पर नीतिनिर्धारण, पुलिस सुधार आदि।वैसे पच्चीस रु किलो देशी घी और अन्य मुफ़्त वस्तुओं का लालच देकर कई राजनीतिक दल मतदाता की गरिमा को गौण करते जरूर नज़र आए।अगर हम पिछले दिनों चर्चा में रहे मुद्दों और उनपर देश की स्थिति पर नज़र डालें तो चुनावी जुमलों की पोल स्वतः ही खुल जाएगी।

चुनावी माहौल में बेशक बीजेपी ने पचास लाख रोजगार देने का वायदा कर दिया पर सच ये भी है कि केंद्र स्तर पर सरकार गत वर्ष लगभग डेढ़ लाख नौकरियाँ ही सृजित कर पाई।हाल ही में आई श्रम आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बेरोजगारी की दर 2015-16 में पाँच प्रतिशत तक पहुँच गई है, जो पिछले पाँच साल का सर्वोच्च स्तर है।पिछले कुछ वर्षों के आँकड़े देखे तो बेरोजगारी दर लगातार बढ़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो हालात काफ़ी ख़राब हैं। ग्रामीण युवाओं को मजबूरन शहरों का रुख करना पड़ रहा है जिससे शहरों में रहने वाले युवाओं के लिए मौजूद रोजगार के अवसर भी कम हुए हैं। कृषि आधारित उद्यमो को बढ़ावा न मिलने से छोटे शहरों और गाँवो में रोजगार सृजन की दर शहरों के मुकाबले काफी कम हुई है।2011 में बेरोजगारी दर 3.8 प्रतिशत थी जो साल दर साल बढ़ते बढ़ते 2016 में पाँच प्रतिशत तक पहुँच चुकी है और निकट भविष्य में इसके और बढ़ने की संभावना है। भले ही 7.3 प्रतिशत की विकास दर के साथ भारत दुनिया में सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था हो पर उसका फ़ायदा रोजगार के क्षेत्र में होता नहीं दिख रहा। निर्यात में आ रही कमी के कारण लोगों की नौकरियां जा रही हैं। कृषि, उत्पादन और कपडा उद्योग जिनमे रोजगार सृजन की सबसे ज्यादा संभावनाएं होती हैं उनपर सरकार का ज्यादा ध्यान नहीं है।

भारत जैसी जनसँख्या वाले देश में जहाँ  बेरोजगारों की पूरी फ़ौज़ तैयार खड़ी है वहाँ श्रम प्रधान उद्योगों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है नहीं तो स्थिति बद से बदतर होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।आंकड़ो से साफ जाहिर है कि बेरोजगारी की समस्या आने वाले दिनों में गंभीर होने वाली है। रोजगार सृजन के उपायों पर  गंभीरता से सोचने की जरुरत है साथ ही सरकार को इस परिस्थिति से निबटने के लिये पहले से सचेत रहना होगा। 

अकाली- भाजपा गठबंधन ने पंजाब में पच्चीस रु किलो देशी घी गरीबो को देने का नया और अचरज भरा वायदा किया पर प्रश्न ये है कि क्या प्रदेश में व्याप्त भुखमरी केवल देशी घी बाँटने से नियंत्रित हो जाती है और नागरिकों के पोषण की चिंता नेताओं को चुनावो में ही क्यों होती है।शासन के पाँच वर्षो में लोगो की जरुरतो का ध्यान रखना क्या सरकार का दायित्व नहीं है?हालात ये हैं कि देश की बहुत बड़ी जनसँख्या को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं है।अभी हाल ही में वाशिंगटन स्थित इंटरनेशनल फ़ूड पालिसी एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार भुखमरी में मामले में भारत की स्थिति काफी शर्मिंदा करने वाली है।118 देशो वाली इस सूची में भारत का स्थान 97वां है। भारत की ज्यादा अच्छी स्थिति नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका की है।

भारत में लगभग पंद्रह प्रतिशत लोगो को भरपेट खाना नसीब नहीं होता वहीँ दूसरी ओर पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों में लगभग चालीस प्रतिशत कुपोषित हैं।तीसरी दुनिया के देशों में एक चौथी दुनिया भी है जिसकी आवाज़ कभी-कभी ही सरकार और मुख्य-धारा के लोगो को सुनाई देती हैं।अक़सर इनकी आवाज़ बाज़ारवाद और झूठे प्रचार के तिलिस्म में ग़ायब हो जाती हैं।भारत में भी ये बात सोलह-आने सही है।

किसानों की कर्जमाफी हर चुनावों में एक अहम् मुद्दा होता है इन चुनावों में भी है।जिन राज्यों में चुनाव आ जाते हैं वहाँ किसानो को कर्जमाफी का प्रलोभन दिया जाता है और जहाँ चुनाव नहीं होते वहाँ के किसानो की सुध बुध लेने वाला कोई नहीं होता। कई राज्यों में तो कर्जमाफी के बाद भी छोटे किसानो की स्तिथि सुधरती नजर नहीं आ रही। आए दिन किसानो की आत्महत्या करने की खबरे अखबारो की सुर्खियाँ बनती रहती हैं।हाल ही में आई नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार भारत में तीस फीसदी ग्रामीण परिवारो पर औसतन एक लाख तीन हज़ार रुपये का क़र्ज़ है।ग्रामीण इलाके के छोटे किसानो को  ब्याज और मूल चुकाना टेढ़ी खीर हो रहा है।नोटबंदी से पैदा हुई समस्याओं के कारण जहाँ एक ओर फसल के सही दाम नहीं मिल पा रहे हैं वहीँ दूसरी ओर लिए गए उधार का ब्याज प्रतिदिन बढ़ रहा है। अर्थ, अर्थव्यवस्था और ई-बैंकिंग से अनजान इन गरीब किसानो के सामने अपने परिवार का भरण-पोषण करना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता है जिसके लिए उन्हें क़र्ज़ लेना पड़ता है और जिंदगी भर ये लोग ब्याज और मूल के चक्रव्यूह में उलझे रहते हैं।

अर्धसैनिक बलो का मुद्दा मीडिया में तो चर्चा में रहा पर राजनीतिक मंचो से इस मुद्दे को किसी ने नहीं उठाया। थोड़े दिन पहले तक जनता को शायद सेना और अर्धसैनिक बलो के जवानो में बहुत अधिक अन्तर न दिखता हो पर इनको मिलने वाले वेतन और सुविधाओं में काफी अन्तर है।

छुट्टियों की कमी, असुरक्षित माहौल,अधिकारियों का दुर्व्यवहार, पद के अनुसार कार्य न मिलना, कम वेतन, पेंशन आदि और बहुत से कारण हैं जो इन जवानो को तनाव से भर देते हैं। इसी बढ़ते तनाव के कारण आये दिन जवानो द्वारा अधिकारियों से मार-पीट करने की खबरें अखबारो की सुर्खियाँ बनती रहती हैं।पर किसी भी राजनीतिक दल ने इनके लिये किसी सुविधा की घोषणा राज्य-स्तर पर नहीं की।हालिया राजनीति में सेना और अर्धसैनिक बलो के नाम पर लोगो को भावुक करने की राजनीति अपने चरम पर है पर इन जवानो की समस्याओं का हल खोजने का प्रयास किसी स्तर पर होता नहीं दिख रहा। 

पुलिस सुधारो का गंभीर मुद्दा भी इन चुनावी सभाओं में नदारद रहा।ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (बीपीआरडी)  की हालिया रिपोर्ट में भारत के पुलिस बलो से सम्बंधित कई चौकाने वाले तथ्य सामने आएँ हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कई पुलिस थानो में वाहन, फोन और वायरलेस जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं।रिपोर्ट के अनुसार देश के पंद्रह हज़ार पाँच सौ पचपन पुलिस स्टेशनों में से एक सौ अठ्ठासी स्टेशन ऐसे हैं जहाँ कोई वाहन उपलब्ध नहीं है, चार सौ दो स्टेशन ऐसे हैं जहाँ कोई लैंडलाइन फ़ोन नहीं हैं वहीँ एक सौ अड़तीस स्टेशनों में वायरलेस सुविधा नहीं हैं।पैंसठ स्टेशन ऐसे हैं जहाँ न तो फोन है न ही वायरलेस की सुविधा।इसके अलावा सरकार लगभग तेईस लाख पुलिस जवानो में से केवल साढे पाँच लाख लोगो को ही सरकारी घर की सुविधा दे पा रही है।जवानो की कमी के कारण पुलिस बलो पर काम का अत्यधिक बोझ है।देश में औसत सात सौ उनत्तीस लोगो पर एक जवान है।उत्तरप्रदेश, बिहार और दिल्ली में तो हालात और भी शोचनीय हैं यहाँ हर जवान के जिम्मे लगभग ग्यारह सौ लोग आते हैं।पुलिस बलो में नई भर्ती, कार्यस्थल पर अच्छा माहौल, नई तकनीक के हथियार और उपकरण,जीवन-रक्षक साधन, बेहतर प्रशिक्षण और दवाब झेलने के गुर सिखाने की व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए जिससे पुलिस बल अपने कार्य को प्रभावी रूप से कर पाएं।

पिछले कुछ चुनावों के दौरान संविदाकर्मियों का मुद्दा कई राजनीतिक दलों के मेनिफेस्टो में शामिल रहा पर इन चुनावो में कोई इनकी समस्या को उठाता नहीं दिख रहा। केंद्र सरकार द्वारा भी लगातार इनके हितों की अनदेखी की जा रही है।

सातवें वेतन आयोग के बाद इनके समान पद पर कार्यरत नियमित कर्मचारी का वेतन इनसे चार गुना हो गया है और ये लोग नाममात्र के वेतन पर जैसे-तैसे अपना गुज़र-बसर करने को मजबूर हैं। स्थिति ये है कि एक ही कार्यालय में कार्य करने वाला नियमित सफाईकर्मी एक पोस्ट-ग्रेजुएट संविदाकर्मी से लगभग दोगुना वेतन ले रहा है।ऐसा नहीं है कि ये अन्तर केवल नियमित और संविदाकर्मियों के मध्य ही है। अलग अलग परियोजनाओं में समान पद पर कार्य कर रहे कर्मचारियों के वेतन में भी बड़ा अन्तर है।एड्स, टीबी और अन्य जानलेवा बीमारियों से लोगो को बचाते ये कर्मचारी अक़्सर संक्रमण का शिकार हो जाते हैं पर हैरत की बात है कि सरकार द्वारा इन्हें कोई चिकित्सा सुरक्षा और अन्य सुविधाएं नहीं दी जातीं।कॉन्ट्रैक्ट कर्मियों के लिए  नीति के अभाव में सरकार इनकी जायज़ माँगों को टालती रहती हैं।

वोटबैंक की राजनीति के चलते कई गंभीर मुद्दों को राजनीतिक दलों ने भुला दिया पर चुनावी फायदे के लिए जाति और सम्प्रायदिक ध्रुवीकरण को आज भी राजनीतिक दल तुरुप का इक्का मानते हैं जिसका उदाहरण माननीय प्रधानमंत्री का शमशान और कब्रिस्तान पर की गई हालिया टिप्पणी है। राजनीतिक मंचो से  अपराध मुक्त समाज का दावा करती सभी पार्टियों ने हालिया  विधानसभा चुनावो में अपराधियों को दिल खोल कर टिकट दिए हैं।कथनी और करनी के बीच इस विशाल खाई से राजनीतिक दलों का दोहरा चरित्र ही उजागर होता है जिसके केंद्र में सिर्फ और सिर्फ वोटबैंक की राजनीति है।जिन राज्यों में पिछले दस वर्षो से  पार्टी की सरकार है वहाँ तो बिजली गाँवो तक नहीं पहुँची पर चुनावी राज्यों के प्रत्येक गाँव में बिजली पहुँचाने का दावा पार्टी के नेताओ द्वारा ताल ठोक कर किया जाता है।

ऐसा नहीं है कि सारी गलती राजनीतिक दलों की है जनता भी इसमें बराबर की दोषी है जो सब कुछ जानते-बूझते हर बार चुनावी जुमलों के झाँसे में आकर गंभीर मुद्दों पर समझौता कर लेती हैं। लोकतंत्र सही मायनों में सफल तब होगा जब राजनीतिक दल किये गए हर वायदे के प्रति जवाबदेह हों और राजनीति का केंद्र सिर्फ़ जनकल्याण और विकास हो।जिसके लिए देश के नागरिको को ही पहल करनी होगी।

अश्वनी राघव “रामेन्दु”


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