हक़ माँगते संविदाकर्मी…

हक़ माँगते संविदाकर्मी

काफ़ी जद्दोजहद के बाद दिल्ली सरकार कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन बढ़वाने में सफल रही है जिसके फलस्वरूप अब दिल्ली में अकुशल मजदूरों को न्यूनतम मासिक वेतन तेरह हज़ार तीन सौ पचास रु मिलेगा जो पहले नौ हज़ार सात सौ चौबीस रु था।वहीँ अर्धकुशल मजदूरों का मासिक वेतन दस हज़ार सात सौ चौसंठ रु से बढ़ाकर चौदह हज़ार छः सौ अठानवे रु और कुशल मजदूरों का ग्यारह हज़ार आठ सौ तीस रु से बढ़ाकर सोलह हज़ार एक सौ बत्तीस रु कर दिया गया है।दिल्ली सरकार द्वारा मजदूरों के वेतन में की गई लगभग सैंतीस प्रतिशत की बढ़ोतरी एक सराहनीय कदम है जो सरकार की कर्मचारियों के मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता दर्शाती है।एक अन्य फैसले में दिल्ली सरकार के अंतर्गत कार्य कर रहे अतिथि शिक्षको के वेतन में भी अच्छी-खासी बढ़ोतरी की गई है जिससे अन्य परियोजनाओं में कार्य कर रहे संविदाकर्मियों में भी आशा बँधी है।

गौरतलब है कि दिल्ली विधानसभा के चुनावों में संविदाकर्मियों का मुद्दा सभी राजनीतिक दलों के मेनिफेस्टो में अपनी जगह बनाने में सफल रहा था जो लम्बे समय से कर्मचारी संगठनो द्वारा किये जा रहे आन्दोलन का परिणाम था जिसका असर इन फैसलो में दिखाई देता है।

पर हालिया हुए पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में संविदाकर्मियों का मुद्दा किसी भी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनीतिक दल द्वारा प्रमुखता से नहीं उठाया गया जिससे इन राज्यों में कार्यरत लाखो संविदाकर्मियों में हताशा का माहौल है।

भारत सरकार की केंद्रीय परियोजनाओं में लम्बे समय से कार्य कर रहे लाखो संविदाकर्मी अपनी “समान कार्य के लिये समान वेतन’ की माँग को अनदेखा किये जाने से खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। एड्स और टीबी जैसी भयंकर बीमारी से लोगो को बचाने में लगे केंद्रीय परियोजनाओं के कर्मचारी आज भी दिल्ली सरकार द्वारा तय किये गए न्यूनतम मासिक वेतन से कम वेतन में कार्य करने को मजबूर हैं जबकि इनकी शैक्षणिक योग्यता और अनुभव किसी भी पायदान के कार्यरत नियमित कर्मचारियों से दोयम नहीं है।

दुर्भाग्य की बात है कि हमेशा संक्रमण के ख़तरे से जूझते इन संविदाकर्मियों और इनके परिवार को किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य या अन्य सामाजिक सुरक्षा प्राप्त नहीं है। संविदा पर कर्मचारी नियुक्त करने के शुरआती दौर में इन कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों की तुलना में अधिक वेतन मिलता था जो सरकारो की इच्छाशक्ति और असंवेदनशीलता के चलते वर्तमान में इनसे आधे से भी कम हो गया है। बढ़ती महँगाई, बेरोजगारी और नौकरी जाने के भय से ये वर्ग काफ़ी समय से हो रहे शोषण को सहता आया है।अब इस वर्ग में लम्बे समय से सरकार द्वारा किये जा रहे भेदभाव पूर्ण रैवैये के ख़िलाफ़ भारी रोष है।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने एक फैसले में इन संविदाकर्मियों को “समान कार्य के लिये समान वेतन” का हकदार माना है।इस फैसले में माननीय न्यायालय ने सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकार-1996 के अंतराष्ट्रीय समझौते का हवाला देते हुए कहा है कि समान कार्य के लिये समान वेतन प्रत्येक नागरिक का हक़ है और कोई भी इन्हें इस हक़ से वंचित नहीं कर सकता।अदालत ने कहा कि समान वेतन न देना अमानवीय, शोषण और दमनकारी है।अपने परिवार की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिये इन्हें कम वेतन पर कार्य करने के लिये मजबूर होना पड़ता है और अपना आत्मसम्मान और गरिमा दाँव पर लगानी पड़ती है।सरकारों का संविदाकर्मियों को नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन न देना या इसके लिये कठिन मापदण्ड बनाना एक गलत परम्परा है जिसे बदलना होगा।वहीँ दूसरी ओर सातवें वेतन आयोग ने भी संविदाकर्मियों के लिये एक यूनिफार्म नीति बनाने की सिफारिश केंद्र सरकार से की है जिससे इन कर्मचारियों के अनुभव और योग्यता के आधार पर पूरे देश में एक समान वेतन की नीति निर्धारित की जा सके।

कम वेतन और बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के अपनी जिम्मेदारियों को मुस्तैदी से निभाते संविदाकर्मियों के मुद्दे सरकारी नीतियों के अभाव के चलते वर्षो से लंबित हैं।फण्ड की कमी,केंद्र और राज्य सरकारो के बीच आपसी समन्वय के अभाव और अन्य कारणों का बहाना बनाकर इस गम्भीर मुद्दे को पिछली सरकारो द्वारा हमेशा ठन्डे बस्ते में डाला जाता रहा है जिससे कर्मचारियों में सरकार के प्रति अविश्वनियता बड़ी है।केन्द्र सरकार को चाहिए कि संविदाकर्मियों की जायज़ माँगो को पूरा करने के लिये तुरन्त नीतिगत सुधार करे जिससे इनके साथ लम्बे समय से हो रहा भेदभाव दूर हो सके।

अश्वनी राघव “रामेन्दु”

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