दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में हो रहे सकारात्मक बदलाव..

दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में हो रहे सकारात्मक बदलाव

हाल ही मैं पेश किये गए दिल्ली सरकार के बजट में शिक्षा के प्रसार और गुणवत्ता में सुधार के लिए भरपूर राशि आबंटित कर उपमुख्य मंत्री मनीष सिसोदिया ने एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसकी सराहना की जानी चाहिए। शिक्षा के बिना किसी भी देश या समाज के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। देश के सतत् विकास के लिये शिक्षा पर ध्यान देना अत्यंत जरुरी है और सरकारें अपनी इच्छाशक्ति से शिक्षा को सुलभ बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

दिल्ली सरकार ने अड़तालीस हज़ार करोड़ रु के अपने पेश बजट में ग्यारह हज़ार तीन सौ करोड़ रु की राशि शिक्षा पर खर्च करने की बात कही है।जिससे अगले वित्त वर्ष में दस हज़ार स्कूली कमरो के निर्माण के अलावा नर्सरी शिक्षा,अर्ली चाइल्डहुड सेंटर्स,नए कॉलेज खोलने,पुस्तकालय, मिड-डे मील आदि पर खर्च किया जायेगा।

पिछले कुछ दशकों से शिक्षा के क्षेत्र में स्तिथि बड़ी तेज़ी से बदली है जिससे शिक्षा क्षेत्र को काफी नुकसान हुआ है। स्कूलो के नाम पर बड़ी बड़ी दुकाने उद्योगपतियों और नेताओं द्वारा शुरू कर दी गईं और इनके गठजोड़ के चलते सरकारी स्कूलों की दशा दिन पर दिन ख़राब होती चली गई। आम आदमी सरकारी स्कूलो में अपने बच्चों को पढ़ाने में कतराने लगा और निजी स्कूलो की मनमानी सहने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं बचा।स्तिथि जब और ज्यादा ख़राब हो गई जब राजनीतिक दल अपने एजेंडे का प्रचार करने के लिए शिक्षा तंत्र का प्रयोग करने लगे।धीरे धीरे स्कूल केवल सरकारी तंत्र का हिस्सा बन कर रह गए और सामाजिक भागीदारी नगण्य हो गई।दिल्ली सरकार ने सरकारी स्कूलो में सामाजिक भागीदारी तय करने के लिए सभी स्कूलो में मैनेजमेंट समितियों के माध्यम से समाज के लोगो और अभिभावको को इस तंत्र से जोड़कर स्कूलो में अनुकूल माहौल देने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में उनकी भूमिका तय की है। नियमित शिक्षक- अभिभावक बैठको का आयोजन भी इसी क्रम में एक बेहतरीन कदम है।

“आप जनता को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य दीजिये देश अपना और समाज का विकास स्वयं कर लेगा” ये अवधारणा शत् प्रतिशत सही है।इस वैश्विक युग में हमें प्रतियोगिता में बने रहने के लिए शिक्षा की गुणवत्ता और प्रसार पर केंद्रित होना ही पड़ेगा। हमारे रंग-रंगीले लोकतंत्र में जहाँ राजनीतिक दल धर्म,जाति और क्षेत्र के चक्रव्यूह में जनता को फँसा अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं वहाँ किसी सरकार द्वारा जनता के स्वास्थ्य और शिक्षा पर ध्यान दिया जाना एक आशा जगाता है।परंपरागत वोटबैंक की राजनीति और स्वार्थ से इत्तर अगर कोई सरकार ऐसे प्रयास कर रही है तो उसकी सराहना होनी चाहिए। बदलाव का माध्यम सिर्फ राजनीतिक दल नहीं बल्कि जनता की भागीदारी भी उसमे अहम् है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा-अनुकूल वातावरण और बेहतरीन पढ़ाई अगर संभव हो पाई तो ये निःसंदेह एक बड़ी उपलब्धि होगी। वो अलग बात है कि जिन नेताओं और उद्योगपतियों ने बड़ी बड़ी दुकाने स्कूलो के नाम पर खोली हैं उनका प्रयास हमेशा इस सकारात्मक बदलाव में रोड़ा अटकाने का ही रहेगा।

अश्वनी राघव


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7 thoughts on “दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में हो रहे सकारात्मक बदलाव..

  1. आप दिल्ली में रहते है क्या ? ये सब साकारात्मक बदलाव न्यूज़ में कम आता है. जब कि इसे बढ़ावा देना चाहिए.

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    1. जी हाँ, दिल्ली में ही रहता हूँ।पिछले 2 साल के दरम्यान सरकारी स्कूलो में लगभग 8000 कमरो का निर्माण हुआ है।साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार हो रहा है।

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    1. मीडिया के पास ऐसी बहुत सी ख़बरे हैं चलाने को जिनसे उनकी स्वार्थ की पूर्ति हो जाती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार ऐसी खबरे दिखा कर क्यों अपना नुकसान किया जाये। हिन्दू-मुस्लिम, गाय-गधा चल रहा है आजकल तो

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