छात्र राजनीति का बिगड़ता स्वरुप…

छात्र राजनीति का बिगड़ता स्वरुप

शिक्षण संस्थानों में असहिष्णुता, पक्षपात और नफरत के लिये कोई स्थान नहीं है” ये टिप्पणी माननीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शुक्रवार को मुम्बई विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान कही। दिल्ली विश्वविद्यालय  में पिछले दिनों एक छात्र संगठन पर लगे हिंसा-प्रदर्शन के आरोपो के बाद आया ये बयान काफी अहम् है।उन्होंने कहा कि हमें संकीर्ण मानसिकता और विचारो को पीछे छोड़ते हुए खुलकर बातचीत और बहस को अपनाना चाहिए।उन्होंने विश्वविद्यालयों को उन्मुक्त विचारो के आदान-प्रदान का सम्मानित मंच बने रहने की बात भी कही।वैसे भी लोकतंत्र की रक्षा के लिये सभी को अपना पक्ष रखने की आज़ादी होना बहुत जरुरी है। महामहिम द्वारा की गई इस टिप्पणी से छात्र संगठनो पर हावी होती मुख्य दलगत राजनीति और शिक्षण संस्थाओं  पर पड़ते इसके  विपरीत प्रभावों पर गहन चिंतन की आवश्यकता महसूस होती है।

भारत में छात्र राजनीति का आरम्भ आज़ादी से लगभग सौ वर्ष पहले अठारह सौ अड़तालीस  में दादा भाई नौरोजी की  “स्टूडेंट सोसाइटी” की स्थापना के साथ हुआ। आज़ादी की लड़ाई में भी छात्र संगठनो ने अहम् भूमिका निभाई थी। वर्तमान में भी भारतीय राजनीति में कई बड़े चहरे हैं जिनकी शुरुआत छात्र राजनीति से हुई है असम के भूतपूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत, अरुण जेटली,लालू प्रसाद यादव आदि भी उसमे शामिल हैं।भारतीय लोकतंत्र में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमे छात्र शक्ति ने सत्ता को अपनी ताक़त दिखाई है और कई सफल आंदोलन किये हैं।जेपी आन्दोलन में भी छात्र संगठनो की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। पर दुर्भाग्यवश वर्तमान छात्र राजनीति से अपना इतिहास दोहराये जाने की आशा करना भी कल्पना से परे की बात है।

आजकल की छात्र राजनीति में सभी छात्र-संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल की छात्र ईकाई के रूप में कार्य कर रहे हैं जिनका एकमात्र लक्ष्य चुनाव जीतना होता है।ये छात्र संगठन चुनाव जीतने के लिए सारे हथकंडे अपनाते हैं जिनका प्रयोग मुख़्य राजनीतिक दल अपने चुनाव जीतने के लिए करते हैं।देश के अधिकतर छात्र नेता खुद अराजकता फैलाते नज़र आते हैं।राजनीतिक दलों के इशारों पर काम कर अपनी टिकट पक्की करना ही उनका एकमात्र लक्ष्य रहता है।अधिकतर छात्र नेताओं का सम्बन्ध किसी न किसी बड़े नेता से होता है और ये नेता अपने प्रियजनों को छात्र-नेता के रूप में स्थापित कर उनका राजनीतिक भविष्य बनाने के लिए अनैतिक कार्यो का सहारा लेने में कोई गुरेज़ नही करते।

छात्र संगठनो के चुनावो में आयोग के नियमो की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए ये संगठन चुनाव प्रचार में पानी की तरह पैसा बहाते हैं।पोस्टरों से पूरा शहर पाट दिया जाता है और पोस्टरबाजी की होड़ में छात्र आपस में भिड़ भी जाते हैं।शराब,लेट-नाईट पार्टीज और हिंसा का भौंडा प्रदर्शन लोकतान्त्रिक मूल्यों और विचारधाराओं पर कुठाराघात करता नज़र आता है। मुख़्य राजनीति की तरह ही छात्र संगठनो द्वारा क्षेत्र और जाति के आधार पर वोट माँगे जाते हैं और वोटो का ध्रुवीकरण करने के प्रयास किये जाते हैं। छात्र जीवन से ही धर्म, क्षेत्र और जाति के नाम पर राजनीति करते हुए इन छात्र नेताओं से भविष्य में सर्वकल्याण और  विकास के मुद्दों पर राजनीति करने की उम्मीद करना बेमानी है।छात्र हितों का चोला ओढ़ राजनीतिक दलों में अपना भविष्य तलाशते इन स्वार्थी नेताओ को छात्र-हितों से कुछ लेना देना नहीं है।ये मात्र राजनीतिक दलों के हाथों की कठपुतली मात्र हैं।
वर्षों से आदर्श छात्र राजनीति के पर्याय रहा जेएनयू भी छात्र राजनीतिे में छा रही नकारात्मकता से अछूता नहीं रहा है। विश्वविद्यालय में हिंसा, छेड़खानी और गुरुजनों से अभद्रता की ख़बरे आये दिन अख़बार की सुर्खियाँ बनती रहती हैं। गैर-जरुरी प्रदर्शनों में व्यस्त यहाँ के छात्र संगठन ने कई दिनों तक प्रशासनिक विभाग के कार्यो में व्यवधान डालकर अपनी ख्याति पर दाग लगा दिया है। माननीय उच्च न्यायालय ने पिछले नौ महीने में विश्विद्यालय में बानवे प्रदर्शन होने पर हैरानी जताई है।छात्र-हित के कार्यों और नशाखोरी की समस्याओं को दरकिनार कर केवल धरना-प्रदर्शन पर केंद्रित रहना छात्र राजनीति के लिए अच्छा संकेत नही है।

अब छात्र राजनीति छात्र-हितों की न रहकर छात्र-हित का आडम्बर कर अपना राजनीतिक भविष्य स्थापित करने भर की रह गई है। छात्रो के मुद्दों पर बात करने की बजाये ये संगठन राजनीतिक दलों के एजेंडे को सर्वोपरि रखते हैं जिससे आम छात्र का इनसे मोहभंग हो रहा है। छात्र-संगठनो में बढ़ते राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप को नियंत्रित करना को प्राथमिकता में रखने की जरुरत है जिससे इन संगठनो के बिगड़ते स्वरुप को सुधारा जा सके। छात्र संगठनो को रचनात्मक कार्यों में ज्यादा व्यस्त रहने की आवश्यकता है जिससे छात्रों का सर्वांगीण विकास हो सके।विश्वविद्यालयों में ऐसा वातावरण तैयार करना हम सभी की जिम्मेदारी है जहाँ सबको निर्भीकता से अपना पक्ष रखने का अधिकार हो तभी भविष्य में हम एक बेहतर समाज और एक बेहतर लोकतंत्र की कल्पना कर सकते हैं।

अश्वनी राघव “रामेन्दु”

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