“कष्ट में हैं किसान”

कष्ट में हैं किसान !!

जन्तर मन्तर पर धरना-प्रदर्शन कर रहे तमिलनाड़ु के किसानो की तस्वीरें आजकल अखबारो की सुर्खियाँ में हैं भले ही वह उनके विरोध-प्रदर्शन के अनोखे तरीके के कारण ही क्यों न हो? भयंकर सूखे की मार झेल रहे इन किसानो के पास अपनी माँगो को सरकार के पास पहुँचाने का कोई और सस्ता तरीका है भी नहीं।कभी वह सूखे के कारण आत्महत्या कर चुके अपने सम्बन्धियों के नरमुंड के साथ प्रदर्शन कर रहे हैं तो कभी साँप और चूहे मुँह में रखकर तस्वीरें खिंचवा रहे हैं।उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ अपनी बात सरकार तक पहुँचाना है तरीका चाहे कोई भी हो। इस मुहिम में धीरे-धीरे अन्य लोगो का भी साथ मिल रहा है जिसमे छात्र भी शामिल हैं।

तमिलनाड़ु में एक सौ चालीस वर्षों के बाद इतना भयंकर सूखा पड़ा है जिसके चलते छोटे और मंझोले किसानो को अपना परिवार पालना भी मुश्किल हो चला है और रही सही कसर लिये हुए कर्ज़ के बढ़ते ब्याज़ ने कर दी है।किसान गाँव छोड़ शहरों में दिहाड़ी-मजदूरी करने पर मजबूर हैं और इनमे पढे-लिखे युवा भी शामिल हैं।स्कूल-कॉलेज की फीस न भर पाने के चलते और परिवार पर आये जीवन-मरण के संकट से जूझने के लिए उन्हें पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने पर विवश होना पड़ रहा है।


सरकार द्वारा जो राशि राहत के लिए आबंटित की गई है वो ऊँट के मुँह में जीरे के समान है जिसे बढ़ाने की माँग ये किसान कर रहे हैं इसके अलावा क़र्ज़ माफ़ी और नदियों को जोड़ने की माँग भी ये किसान कर रहे हैं। क़र्ज़ लेकर दिल्ली पहुँचे ये किसान लगभग बीस दिन से जन्तर मन्तर पर डेरा जमाये बैठे हैं और आर-पार की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं।

कुछ दिन पहले आई नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार भारत में तीस फीसदी ग्रामीण परिवारो पर औसतन एक लाख तीन हज़ार रुपये का क़र्ज़ है। दूसरी ओर लगभग बाईस फीसदी शहरी परिवार औसतन लगभग सैंतीस लाख रुपये के कर्ज़दार हैं।ग्रामीण इलाके के छोटे किसानो को  ब्याज और मूल चुकाना टेढ़ी खीर हो रहा है।सूखे के कारण जहाँ एक ओर फसल बर्बाद हो वहीँ दूसरी ओर लिए गए उधार का ब्याज प्रतिदिन बढ़ रहा है।जाहिर सी बात है कि बैंक में खाता न होने की स्थिति में छोटे किसानो ने गाँव के साहूकारों से ही ब्याज पर रकम ली होगी ऐसे में किसानो पर दोहरी मार पड़ रही है एक तो उनके सामने परिवार के भरण-पोषण का सवाल उठ खड़ा हुआ है वहीँ दूसरी ओर उनका क़र्ज़ भी बढ़ता जा रहा है।बढ़ते आर्थिक संकट के चलते मजबूरन कई किसान आत्महत्या भी कर चुके हैं और किसानो की ये समस्या देशव्यापी है।बीते कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और अन्य राज्यों में भी सैकड़ो किसान आत्महत्या कर चुके हैं।


बुधवार को संसद में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई और सम्मानित सदस्यों ने धरने पर बैठे किसानो के  प्रति अपनी सहानुभूति भी दिखाई पर केवल कोरी सहानुभूति से कुछ होने वाला नहीं है जमीन पर कदम उठाये जाने की जरुरत है। वर्तमान समय में राजनितिक पार्टियों ने किसानो से जुड़े मुद्दों पर जो असंवेदनशीलता दिखाई है उससे सरकार की विश्वनीयता में कमी आई है।चुनावो के समय किसानो के क़र्ज़ माफ़ करने के बड़े बड़े प्रलोभन दिए जाते हैं और सत्ता में आते ही सरकारें अपने वायदे से मुकर जाती हैं।उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावो में भी क़र्ज़ माफ़ी का वायदा करने के बावजूद सरकार बनते ही अरुण जेटली ने किसानो की क़र्ज़ माफ़ी में केंद्र सरकार की असमर्थता जता दी। एसी लगे बंद कमरो में  बैठकर किसानो की चिंता का दिखावा करने वाले देश के कर्णधारो को किसानो की समस्याओं के बारे में पता भी है या नहीं ये शंका भी सौफीसदी सही है। जमीनी हकीकत से रूबरू हुए बिना इनसे कोई हल निकालने की उम्मीद करना भी बेमानी है। 

बढ़ते क़र्ज़ के अलावा भी कई ऐसी समस्याएँ हैं जिनका सरकार के मामूली हस्तक्षेप से हल निकल सकता है पर सरकार इन मुद्दों पर भी गंभीर नज़र नहीं आती। इन समस्याओं में खाद की उपलब्धता न होना,फसल का उचित मूल्य न मिल पाना, बाबुओं की रिश्वतखोरी आदि शामिल हैं।मौजूदा सरकार के सभी नियम मध्यम और उच्च वर्ग को केंद्र में रखकर बनाये जा रहे हैं जबकि सरकारो को नियम और कानून बनाने से पहले सभी वर्गों की जरुरतो का ध्यान रखने की जरुरत है। भारत शुरू से ही कृषि-प्रधान देश के रूप में जाना जाता रहा है कहीं ऐसा न हो कि गलत नीतियों के चलते अर्थ-व्यवस्था की रीढ़ रहे ये किसान हाशिये पर रह जाएँ।जिसका नुकसान हम सभी को होने वाला है।


अश्वनी राघव “रामेन्दु”

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9 thoughts on ““कष्ट में हैं किसान”

  1. भारत कृषि प्रधान देश है किसान देश की रीढ़ है अगर ये कष्ट मैं है तों पूरा देश झुक कर टेढ़ा हो जायेगा

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  2. Youve brought a very painfully true topic to light with amazing simplicity. Their plight is something like a mirror to the India Shining afterglow that we are living in. How sad that while India progresses, some of us Indians can’t even see the light. Very well written

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