“उदास होते शहर”

उदास होते शहर!!

डब्ल्यूएचओ ने इस वर्ष “विश्व स्वास्थ्य दिवस” पर मानसिक रोगों ख़ासकर ‘अवसाद’ की बढ़ती समस्या पर चिंता जताई है और लोगो को मानसिक बीमारियों के प्रति जागरूक करने की जरुरत पर बल दिया है। अवसाद एक मानसिक रोग है और इसकी व्यापकता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रति वर्ष विश्व में लगभग आठ लाख लोग अवसाद के कारण आत्महत्या कर लेते हैं।एक अनुमान के अनुसार प्रत्येक पैंतालीस सेकंड में अवसाद के एक रोगी की मृत्यु हो जाती है।आत्महत्या के लगभग दो तिहाई मामलो के पीछे अवसाद होता है।डब्ल्यूएचओ के अनुसार विश्व में लगभग तीन सौ मिलियन लोग डिप्रेशन के शिकार हैं।पिछले दस सालो में भारत में भी अवसाद के रोगियों में लगभग बीस प्रतिशत का इजाफ़ा हुआ है।हर वर्ष लगभग दस मिलियन लोग भारत में इस समस्या का शिकार हो रहें हैं जो कि गंभीर चिंता का विषय है।

अक़सर हम डिप्रेशन को उदासी समझ लेते हैं। उदासीअवसाद का एक लक्षण तो हो सकती है पर दोनों में एक बड़ा अन्तर है। उदासी एक सामान्य प्रकिया है जिसका अनुभव सबको होता है और ये थोड़े समय के लिए होता है। अवसाद एक मानसिक समस्या है जिसमे व्यक्ति लंबे समय तक उदास रहता है और रोज़मर्रा की गतिविधियों पर भी इसका असर पड़ता है।इसके अन्य लक्षणों में चिड़चिड़ापन, खालीपन महसूस होना,अपराधी होने की भावना का घर कर जाना, किसी कार्य को करने का मन न करना, मन का केंद्रित न हो पाना,निराशावादी हो जाना, नींद न आना, भूख न लगना, थकावट, आत्महत्या करने का मन होना आदि हैं। मनवाफ़िक रोजगार न मिलना, आशा अनुरूप सफलता न मिलना, लंबे समय का तनाव, लंबी बीमारी, शारीरिक बदलाव आदि डिप्रेशन का कारण हो सकते हैं लेकिन जरुरी नहीं की केवल इन्ही कारणो से ये होता है हार्मोनल असंतुलन भी इसका एक बड़ा कारण है। महिलाओं को प्रसव के उपरान्त अवसाद का शिकार होते देखा गया है।बच्चे, किशोर, वयस्क, वृद्ध सभी इसका शिकार हो रहे हैं।

डिप्रेशन का ईलाज़ सम्भव है पर जागरूकता की कमी के चलते लोग इसे बीमारी नहीं समझते और चिकित्सकीय सलाह लेने में हिचकते हैं।उपचार की कमी के चलते ये रोग बढ़ता जाता है और रोगी और परिवारजन ताउम्र परेशान होते रहते हैं।अधिकतर मामलो में देखभाल करने वाले भी अवसाद का शिकार हो जाते हैं।अभी हाल ही में एक ख़बर छपी थी जिसमे अवसादग्रसित एक वृद्ध-दम्पति ने खुद को  महीनो एक कमरे में बन्द कर लिया था और जब उनको बाहर निकाला गया तो उनकी हालत बहुत नाज़ुक थी।ऐसी घटना आजकल बहुत आम हैं।कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक व्यक्ति ने अवसाद के चलते आत्महत्या कर ली और उसका वीडियो बनाकर अपने पिता को भेज दिया।
अगर आपको अपने या किसी अन्य के व्यवहार में अचानक कोई बदलाव महसूस होता है,रोजमर्रा की गतिविधियाँ जैसे नहाना, बिस्तर से उठना आदि करने में आलस होता है,लोगो से बात करने का मन न होना, बार- बार आत्महत्या करने के विचार मन में आना, भूख नहीं लगना, अपराधबोध लगता है तो तुरन्त अपने विश्वनीय मित्र से बात करें और विशेषज्ञ की सलाह लें।समय से शुरू किये उपचार से अवसाद पर नियंत्रण संभव है।कभी उपरोक्त लक्षणो को नज़रअंदाज़ न करें।

अवसाद के मरीजो के उपचार में परिवार और समाज की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। परिवार से मिल रहा भावनात्मक सहयोग, और सम्मान पीड़ित को बीमारी से लड़ने में सहायता करता है।समाज का भी दायित्व है कि मानसिक रोग से ग्रसित व्यक्तियों के साथ भेदभाव न करें और ये समझे कि हर मानसिक रोगी पागल नहीं होता।कुछ दिनों पहले लोकसभा में “मानसिक स्वास्थ्य सेवा विधेयक-2016” पारित हुआ है जो मानसिक रोगों से पीड़ित  लोगो को सुरक्षा और उपचार का अधिकार देता है।ये विधेयक  मरीज़ों को सशक्त बनाता है और उन्हें कई सुविधाएँ और अधिकार प्रदान करता है।हम सभी का कर्तव्य है कि एक-दूसरे से मानसिक रोगों के बारे में बात करें और लोगो की गलतफहमियों को दूर करें।मानसिक बीमारियों काभी शारीरिक बीमारियों की तरह ईलाज़ करवायें और समाज में फैले अंधविश्वास और भ्रांतियों को दूर करने में अपना योगदान दें। मानसिक रोगों का ईलाज संभव है,जरुरत है बस अपनी जिम्मेदारी समझने की और जागरूक रहने की।

अश्वनी राघव “रामेन्दु” 

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