“सच का आईना”

सच का आईना !! (कविता)



कुछ उबलता हुआ सा लगता है,

शायद बाहर या फ़िर मेरे अन्दर।


शहर पिघलता हुआ सा लगता है,

चारो तरफ़ धुआँ-धुआँ लगता है।


सब रिश्ते-नाते खो गए हैं कहीं,

या फ़िर मैं ही उन्हें ढूंढ नहीं पा रहा।


डरता हूँ उबलते-उबलते कहीं,

खत्म न हो जाये आँखों की नमी।


नमी जो जिन्दा रखती है,

विचारों को,इंसानियत को।


वैसे अब मैं भी कुछ-कुछ

सूखा सूखा सा लगता हूँ।


सोचता हूँ ये शहर छोड़ दूँ,

तभी कुछ साफ़ नज़र आएगा।


बाहर का सच और,

शायद अन्दर का भी।



अश्वनी राघव “रामेन्दु”

“Sach ka aaina” poem was written by me way back in 2003,when I was doing my graduation..

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15 thoughts on ““सच का आईना”

    1. शुक्रिया स्मृति स्नेहा जी,
      ब्लॉग के माध्यम से हम अपनी रचना तो एक दूसरे को पढ़वा देते हैं पर उसके बाद?? रचनाएँ पोस्ट डेटेड हो जाती हैं।

      Liked by 1 person

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