‘ठेके के कर्मचारी’

ठेके के कर्मचारी!! (कविता)


दौड़ते-भागते

हाँफते-खाँसते

रोज़ पीछा करते हैं

हम बसों का,


रोते-खीझते

डाँटते-पसीजते

रोज़ सामना करते हैं

हम अपनों का,


परेशान-निराश

लड़ते-गिड़गिड़ाते

रोज़ गला घोंटते हैं

हम सपनो का,


बड़े सलीके से छुपाते हैं

घिसे कॉलर सरीखी इज्ज़त

इकलौते कोट के नीचे,


जी-हाँ

हम आशावान-निष्ठावान

ठेके के कर्मचारी हैं।



अश्वनी राघव “रामेन्दु”

ठेके के कर्मचारी- संविदाकर्मी, contractual employees

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4 thoughts on “‘ठेके के कर्मचारी’

  1. क्या बात—-बड़े सलीके से छुपाते हैं,घिसे कॉलर सरीखी इज्ज़त,इकलौते कोट के नीचे—- बहुत अच्छा लाईन

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