“आधी आबादी पर होती हिंसा”

 

“आधी आबादी पर होती हिंसा”

गत शनिवार राजेन्द्र इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज,राँची में झारखण्ड के लातेहर इलाके की एक अट्ठाइस वर्षीय महिला ने दम तोड़ दिया।उसका क़सूर बस इतना था कि उसने अपने पडोसी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने से मना कर दिया था जिससे कारण मानव रूपी उस पिशाच ने महिला के गुप्तांग में शराब की बोतल डाल दी।चोट से लहूलुहान महिला को अस्पताल में दाखिल करवाया गया जहाँ उसने तीन दिन बाद दम तोड़ दिया।हृदय को झकझोर जाने वाली इस पाशविक घटना ने  समाज में महिलाओं की स्थिति पर एक बार फिर हम सबको सोचने पर मजबूर कर दिया है।

उपरोक्त घटना में जो गौर करने वाली बात है वो ये है कि पीड़ित महिला विधवा थी और आरोपी पिछले एक वर्ष से उसपर शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए दवाब बना रहा था।अकेली महिला को कमजोर जान उसका शोषण किया जाना हमारे समाज में आम बात है पर इतनी पैशाचिकता हमारे समाज के सभ्य होने पर ही एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा देती है। वर्ष 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप के विरोध में उमड़ी जनता के बाद ऐसा लग रहा था कि महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा में कमी आएगी और सरकार और संस्थाएँ मिलकर महिला सुरक्षा के लिये प्रयास करेंगी।ऐसा नहीं है कि कुछ प्रयास नहीं किये गए पर जिस समाज में महिलाओं के साथ हिंसा करना पुरुष अपना अधिकार मानते हों वहाँ क़ानून का क्रियान्वयन बिना राजनैतिक इच्छाशक्ति और पुरुषों की मानसिकता में बदलाव के संभव नहीं है।

हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ महिलाओं का यौन रूप में पवित्र होना पुरुषो के सम्मान का प्रतीक समझा जाता है। जिसका खामियाजा भी महिलाएं ही भुगतती हैं।आपसी रंजिश में एक दूसरे के परिवार के सम्मान को ठेस पहुँचाने मात्र के लिये पुरुष महिलाओं को यौन हिंसा का शिकार बनाते आएं हैं।वर्ष 2015 में महिलाओं के साथ हुए बलात्कार की संख्या लगभग चौंतीस हज़ार रही जिसमे से अठानवे प्रतिशत आरोपी पीड़िता के जान पहचान वाले ही थे।इस संख्या में नवजात बच्ची से लेकर अस्सी वर्षीया वृद्धा तक शामिल है।
महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा एक वैश्विक समस्या है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की अस्सी प्रतिशत महिला सांसद भी कभी न कभी यौन हिंसा की शिकार हो चुकी हैं। महिलाओं के साथ हिंसा पूरे विश्व में फैली एक भयानक समस्या है।वैश्विक दृष्टि से अगर हम देखे तो प्रत्येक तीन महिलाओं में से एक के साथ बलात्कार होता है या उसे पीटा जाता है या उसे जबरन देह-व्यापार में उतार दिया जाता है।मानव अधिकारों का ये सबसे बड़ा उल्लंघन है जिसमे महिलाओं को सुरक्षा, सम्मान, स्वतंत्रता और मूलभूत आज़ादी से मरहूम रखा जाता है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सवाल किया कि “क्या इस देश में महिलाओं को शांति से जीने का अधिकार नहीं है।”कोई व्यक्ति किसी महिला पर प्रेम करने का दवाब नहीं बना सकता।अदालत ने कहा कि महिला की ख़ुद की स्वतंत्र पसंद होती है।जरुरत है कि महिलाओं के साथ होने वाली हर हिंसा को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाये और उन्हें दूर करने के हरसंभव प्रयास किये जाएँ।

हर चर्चित घटना के बाद नए कानून बनाने और पुराने कानूनों में संशोधन करने की बात होती है और किये भी जाते हैं पर इनका किर्यान्वयन और प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं देता।महिला हिंसा की रोकथाम के लिये जरुरी है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर जिम्मेदारी उठाएँ।केवल कानून के भरोसे सदियों से चली आ रही घोषणाएँ, पारंपरिक मान्यताएँ, धार्मिक विचार, नैतिक मूल्य और पितृसत्तात्मक सोच को खत्म नहीं किया जा सकता।अगर समाज का हर वर्ग इस समस्या को जड़ से समाप्त करने का संकल्प ले और एक दूसरे के साथ मिलकर काम करें तो निःसंदेह महिलाओं के साथ हो रहे शारीरिक, आर्थिक,  सामाजिक और व्यक्तिगत अत्याचार पर अंकुश लगाया जा सकता है।



अश्वनी राघव “रामेन्दु”

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6 thoughts on ““आधी आबादी पर होती हिंसा”

  1. Bilkul sahi aapne farmaya… Jab tak hum apne desh ke aadmiyon ki soch nahi badalte, aise ghinoni harkatein humesha hoti rahengi, Phir chahe kitni hi Nirbhaya shaheed ho jaayein… Hume chahiye ki hum apne aane wali peedhi ko yeh samjhaayein ki ladki hone ka matlab kamzor hona nahin, aur ladka hone ka matlab kukarmi hona nahin hota.

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    1. जी, संस्कार अगर होते हैं तो वो घर से आते हैं।बदलाव की शुरुआत भी आपके हमारे घरो से ही होगी।हम उस तथाकथित सभ्य समाज में रहते हैं जहाँ बच्चे बचपन से ही गालियाँ देना सीख जाते हैं।जिनमे महिलाओं के अंगो की वीभत्स तरीके से व्याख्या की जाती है।

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  2. ज्वलंत प्रश्न है जिसका समाधान सिर्फ सोच बदलने से निकल सकेगा । साथ है चाहिए ऐसे कानून और न्याय प्रक्रिया जो अति शीघ्र न्याय करें और कड़ा दंड दे ताकि ऐसे अपराधी सोच भी न सकें ।

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