भविष्य की आशा है “आप”

भविष्य की आशा है “आप”


भारत के लोकतंत्र की सबसे अच्छी बात ये है कि यहाँ सभी राजनीतिक दलों और व्यक्तियों के लिये जगह है।चुनावी जीत या हार से किसी भी राजनीतिक दल के भविष्य का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता चाहे वह भाजपा हो, काँग्रेस हो या आम आदमी पार्टी। दूसरा केवल जीती हुई सीटो के गणित के आधार पर जनता की मर्ज़ी का सही अंदाज़ा नही लगाया जा सकता।मीडिया पर चल रही मोदी लहर की निरंतर चर्चा केवल जनता को एक पक्षीय पहलू दिखाने की सोची समझी रणनीति है।सच्चाई ये है कि बीजेपी को वर्ष दो हज़ार बारह के निगम चुनावो में 36.74%, दो हज़ार सत्रह के निगम चुनावों में 36.18%, दो हज़ार पंद्रह के विधानसभा चुनावो में 32.2% और दो हज़ार चौदह में हुए लोकसभा चुनावों में 46.40% वोट मिले।इन आँकड़ो के अनुसार बीजेपी को मिले मतों में लगभग 10% तक की गिरावट हुई लेकिन सीटो के हिसाब से देखें तो निगम में लगभग 30% का इजाफ़ा हुआ जो एक सौ बयालीस से बढ़कर एक सौ इक्यासी हो गईं।


दूसरी तरफ काँग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए दो हज़ार पंद्रह में हुए विधानसभा चुनावों में मिले 9.6% मतों को बढ़ाकर दो हज़ार सत्रह के निगम चुनावों में लगभग तीन गुना 21.11% कर लिया पर पिछले निगम चुनावो में मिले 30.5% से ये काफी कम है।ये कहना बिल्कुल बेमानी होगा कि अधिक सीट जीतने का मतलब किसी पार्टी के पक्ष में चल रही लहर ही होती है।कई बार परिणाम को अन्य कारण भी प्रभावित करते हैं।


हालिया संपन्न हुए निगम चुनावो में आम आदमी पार्टी का मत प्रतिशत सबसे ज्यादा गिरा है पर इसका ये कतई मतलब नही की पार्टी का कोई भविष्य नहीं। अगर ऐसा ही था भाजपा और काँग्रेस के दो हज़ार पंद्रह विधानसभा चुनावो के प्रदर्शन को देखते हुए तो इन दोनों  दलों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाना चाहिए था।विपक्षी दलों का ये कहना कि आम आदमी पार्टी का भविष्य ख़त्म होने के कगार पर है ये उनकी असुरक्षा को दर्शाता है जो आम आदमी पार्टी के तेज़ी से होते विस्तार से ही उपजी है।

ऐसा नहीं है कि आम आदमी पार्टी में सब कुछ सही ही चल रहा है।पार्टी की सबसे बढ़ी कमी उसकी अनुभवहीनता है।पंजाब और गोआ चुनावो में उतावलेपन से किये गये फैसलों और स्थानीय नेताओ को उनमे शामिल नहीं किये जाने से कार्यकर्ताओं में नाराज़गी दिखी।जिसका प्रभाव भी चुनावी परिणाम में दिखा। पंजाब में पार्टी की अच्छी शुरुआत हुई पर अपेक्षाएं इतनी ऊँची थीं कि जहाँ जश्न मनाना चाहिए था वहाँ दुःख का माहौल था। अगर शीर्ष नेतृत्व व्यवहारिक लक्ष्य रखता तो मीडिया भी ऐसी शुरुआत की तारीफ़ ही करता।

केवल चार वर्षो में सत्तासी विधायक, तीन सांसद और अड़तालीस पार्षद होना एक उपलब्धि है पर नेताओं का उतावला और बड़बोलापन इस उपलब्धि को गौण कर देता है। पार्टी के विस्तार को अगर निष्पक्षता से देखे तो पार्टी का प्रदर्शन तारीफ़ के काबिल हैं।कई लोग ये कहते हैं कि पार्टी को केवल दिल्ली में केंद्रित रहना चाहिए पर व्यवहारिकता ये कहती है कि दिल्ली के अलावा अन्य राज्यों में पार्टी का विस्तार बहुत जरुरी है क्योंकि दिल्ली एक केंद्र शाषित प्रदेश है यहाँ पार्टी चाहते हुए भी अपना बेहतरीन प्रदर्शन नहीं कर सकती।

दिल्ली में हाल ही में हुए निगम चुनावो में रणनीतिकारों की अनुभवहीनता का असर एक बार फिर देखने को मिला। पार्टी रणनीतिकारो को ये समझना चाहिए था कि दो हज़ार पंद्रह विधानसभा चुनावो में हुई अभूतपूर्व विजय का कारण लोगो  का परंपरागत पार्टियों से हुआ मोहभंग था।लेकिन अब स्थिति पूर्णतया अलग थी अब टक्कर सीधे सीधे ऐसी पार्टियों के साथ है जो निःसंदेह उनसे ज्यादा अनुभवी और चतुर हैं।कई कारण रहे जिनके कारण आम आदमी  पार्टी का प्रदर्शन आशानुरूप नहीं रहा।


लगभग दस हज़ार कार्यकर्ताओं ने निगम चुनावो के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत की।लोकतंत्र के लिये ये अच्छी बात है पर व्यवहारिकता ये है कि आप केवल दो सौ बहत्तर टिकट देकर नौ हज़ार सात सौ अट्ठाइस कार्यकर्ताओं को नाराज़ होने का अवसर भी दे रहें हैं।विधायको और पार्टी स्तर पर इनकी नाराज़गी को दूर करने के प्रयास न किये जाने से ये कार्यकर्ता खुद को ठगा महसूस करने लगे।जिसका फायदा स्वराज इंडिया, जनता दल यूनाइटेड आदि संगठनो ने उठाया।पार्टी द्वारा टिकट जल्दी बाँट देने के चलते नाराज़ और महत्वाकांक्षी सदस्यों के पास अन्य पार्टियों म जानेें या निर्दलीय उम्मीदवारी पेश करने का पूरा समय था।जिससे आम आदमी पार्टी को नुकसान हुआ एक तरफ तो नाराज़ कार्यकर्ताओं ने चुनाव प्रचार से दूरी बना ली वहीँ दूसरी और चुनाव में खड़े होकर वोटबैंक में भी घात लगाई।जल्दी टिकट बाँट देने से एक तरफ तो चुनाव प्रचार के अंतिम समय में कार्यकर्ताओं की ऊर्जा भी कम हुई दूसरी तरफ कई प्रत्याशी चुनावो में होने वाले ख़र्चे को झेलने में भी असमर्थ दिखे।

चुनावो में इन निर्दलीय और छोटी पार्टियों से चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों ने लगभग बारह प्रतिशत वोट लिए जिनकी संख्या नौ लाख अड़सठ हज़ार के लगभग रही।जिसका सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी पार्टी को ही हुआ।

दिल्ली में सड़सठ विधायक होते हुए भी पार्टी को इतनी कम सीटो पर जीत मिलना एक गंभीर स्थिति है। सरकार द्वारा किये जा रहे कार्यों को जनता तक पहुँचाने में ये विधायक नाकाम रहे।अगर औसत देखे तो प्रति विधायक एक सीट भी हिस्से में नहीं आती है।बिजली और पानी बिल में कटौती, टैंकर माफिया से मुक्ति, मोहल्ला क्लिनिक, स्कूल, बढ़ाई गई पेंशन ऐसे मुद्दे थे जिन को अगर जनता में सही तरीके लेकर जाया जाता तो स्थिति आज उलट होती।विधायको की कार्यशैली पर गंभीर विचार किये जाने की जरुरत है।

पंजाब और गोआ चुनावो के बाद पार्टी की द्वितीय पंक्ति के कुछ नेताओं की विश्वनीयता में भी कमी आई है।कई तरह के आरोप भी उनपर सोशल मीडिया पर लगाये जा रहे हैं।चूँकि आम आदमी पार्टी  स्वस्थ राजनीति के वायदे के साथ राजनीति में आई थी इसीलिये ऐसे आरोपो की जड़ में जाना बहुत जरुरी है।नेताओं की घटती विश्वनीयता भी पार्टी के आशानुरूप प्रदर्शन न कर पाने का एक कारण है। नाराज़ कार्यकर्ताओं और नेताओ पर लगते आरोपो का ऐसा शोर मचा कि जनता को पार्टी में सब गड़बड़ नज़र आने लगा।जो सिर्फ एक क्षणिक स्थिति थी और  सभी पार्टियों में आती है पर नौसिखियेपन के कारण आम आदमी पार्टी को नुकसान झेलना पड़ा।अगर इन सब परिस्थितियों का प्रबंधन ढंग से कर लिया जाता तो पार्टी निगम में शतक तो अवश्य बना लेती।

आम आदमी पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दलों में एक बहुत बड़ा अन्तर है अन्य दल किसी विशेष धर्म या जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनका समर्थन उन्हें हर हाल में मिल ही जाता है चाहे उनका प्रदर्शन अच्छा न भी हो।केजरीवाल को जनता ने इसीलिये आँखों में बिठाया क्योंकि उन्हें साफ़ सुथरी व्यवस्था और विकास चाहिए था जिसके लिये अच्छा प्रदर्शन करना ही होगा।केंद्र सरकार से भी रिश्ते मधुर करने होंगे जिससे जनोपयोगी कार्यो में अनावश्यक विलम्ब न हो।जनता अरविन्द केजरीवाल को अपने बीच देखना चाहती है।गरीब- मजदूर आज भी केजरीवाल को अपना नायक मानते हैं। पार्टी का भविष्य उज्जवल है जरुरत है संयम और समझदारी से सही फैसले लेने की।निगम चुनाव का परिणाम अगर सीटो के गणित से इत्तर देखा जाये तो आम आदमी पार्टी की संभावनाओं को मजबूती ही प्रदान करता दिखता है।


अश्वनी राघव “रामेन्दु”

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8 thoughts on “भविष्य की आशा है “आप”

      1. जी, AAP की परफॉरमेंस अच्छी है दिल्ली में। पर निगम के चुनाव पर स्थानीय मुद्दों की जगह गाय, गोबर,हिन्दू मुस्लिम ही भारी पड़ा☺

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