पत्रकारिता पर प्रश्न ??


पत्रकारिता पर प्रश्न ??

हर वर्ष तीन मई को मनाया जाने वाला “विश्व प्रैस स्वतंत्रता दिवस” पत्रकारिता की मूलभूत आज़ादी के उत्सव के साथ ही उन पत्रकारों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का भी दिन है जिन्हें सिर्फ अपना कार्य निष्पक्षता से करने के कारण जान गँवानी पड़ी।संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने उन्नीस सौ तिरानवे में तीन मई को विश्व पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस मनाये जाने की घोषणा की। स्वतंत्र, निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता किसी भी देश के समग्र विकास लिए उतनी ही जरुरी है जितनी की विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका जैसी अन्य संस्थाएं।पर प्रश्न ये है कि बाज़ारवाद के वर्तमान युग में क्या वास्तव में पत्रकारिता अपने निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप में विद्यमान है?

भारत में पिछले चौदह महीनो में पत्रकारों पर चौवन जानलेवा हमले दर्ज़ किये गए जो वास्तविक सँख्या से काफ़ी कम हैं।गैरकानूनी खनन और निर्माण, राजनीति, कट्टरवाद, भ्रष्टाचार आदि विषयों पर कार्य करने वाले पत्रकार इन हमलो का ज्यादा शिकार हुए हैं। पत्रकारों को कई बार नेताओं और भीड़ द्वारा की गई हिंसा का सामना भी करना पड़ा जो कि गंभीर चिंता का विषय है।बात सिर्फ हमलो तक ही सीमित नहीं है कई बार प्रशासन और सरकारें भी पत्रकारिता की स्वतंत्रता को बाधित करते हैं। पठानकोट हमले की खबर चलाये जाने पर एनडीटीवी चैनल पर सरकार द्वारा लगाया गया प्रतिबन्ध इसका ज्वलन्त उदाहरण है।वो अलग बात है कि माननीय सर्वोच्च न्यालालय ने इस प्रतिबंध पर रोक लगा दी थी। सरकारो द्वारा इंटरनेट सेवाएं बाधित करना भी नया नहीं है।

अन्तर्राष्ट्रीय प्रैस निगरानी संस्था रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) द्वारा जारी की गई दो हज़ार सत्रह की सूची के अनुसार भारत अब दो हज़ार सोलह की तुलना में तीन स्थान पिछड़ एक सौ छत्तीसवें स्थान पर आ गया है।अफगानिस्तान और फिलिस्तीन जैसे राष्ट्र भी हमसे बेहतर स्थिति में हैं।ये रैंकिंग पत्रकारिता के लिये आवश्यक स्वतंत्रता और भयमुक्त वातावरण को दर्शाती है जिसमे भारत का प्रदर्शन निराशाजनक है।ये कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं की स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए अभी देश में बहुत प्रयास किये जाने की जरुरत है जो राजनैतिक इच्छाशक्ति के बिना संभव नहीं।

कड़वा सच ये भी है निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता में मीडिया संस्थान भी बराबर के दोषी हैं केवल नेताओँ और दबंगो को ही इसका जिम्मेदार ठहराना एकतरफ़ा होगा। इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है जो पत्रकारों की ईमानदारी और निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न करता है।वैसे तो नेताओं और उद्योगपतियों से मीडिया की सांठ-गांठ का सिलसिला पुराना है पर पिछले पच्चीस वर्षों  में पत्रकारिता के आदर्शों और मूल्यों में व्यापक कमी महसूस की जा रही है।सरकार की आलोचना को आदर्श मानने वाली पत्रकारिता की जगह अब सरकार की चापलूसी ने ले ली है। सरकारी तंत्र और नीतियों की कमी को उजागर करना जिम्मेदार पत्रकारिता की पहचान हुआ करती थी जो अब कभी कभी ही दिखाई देती है। हाल ही में मीडिया में भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ की गई  कार्यवाही की झूठी खबर कई समाचार चैनल्स द्वारा प्रसारित की गई जिसका खंडन सेना को करना पड़ा। ये घटना पत्रकारिता की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाती है।

पत्रकारों को मिले विशेष सरंक्षण कानून का पतन, खबर की बजाए मुनाफे को प्राथमिकता देना ,मीडिया में उद्योगपतियों का निवेश और निजी स्वार्थ आदि ऐसे कई कारण हैं जिससे निष्पक्ष पत्रकारिता का खात्मा हो रहा है। कम से कम विचारों का उत्पादन कर ज्यादा से ज्यादा बिक्री करने के प्रयासों से जहाँ एक ओर कई पत्रकार मालामाल हुए हैं वहीँ दूसरी ओर विचारों की दरिद्रता को भी बढ़ावा मिला है। हाल ही में मीडिया में बड़ी सम्प्रायदिकता के पीछे मीडिया संगठनो की व्यावसायिक महत्वकांक्षा और स्वार्थ ही हैं जो उन्हें खास राजनीतिक दलों के साथ मधुर सम्बन्ध बनाये रखने को प्रेरित करते हैं।
पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धान्तों में शांति और अमन बनाये रखना भी शामिल है पर आजकल कई मीडिया संस्थान सम्प्रायदिक और कट्टरवादी विचारो को प्राथमिकता से दिखाते नज़र आते हैं। एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में सब खुद को ज्यादा कट्टर साबित करने में लगे हैं।इसके उलट पत्रकारिता का ये फ़र्ज़ बनता है कि सभी सम्बंधित पक्षों का नज़रिया सामने रख बात-चीत से हल निकालने की वकालत करे।

कमजोर का पक्ष लेने की आदर्श परम्परा का अंत होने से किसानो, मजदूरो और अन्य कमज़ोर तबकों की आवाज़ अब किसी अख़बार की सुर्खियाँ नही बनती।सूखा, बाढ़ और अकाल से ग्रस्त नागरिक मीडिया के लिये अब जरुरी नहीं रहे क्योंकि इन खबरो से मुनाफा नही आता।अब मीडिया केवल वही खबर दिखाता है जो बिकती है या जिससे व्यासायिक या निजी हित सधते हैं। बाज़ारवाद के सिद्धान्तों का पालन करते हुए व्यावसायिक घरानो ने मीडिया को भी बिकाऊ माल बनाकर पत्रकारिता का जो अवमूल्यन किया है उसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा।पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा जब स्वयं एक बहुत बड़ा खतरा बन जाये तो कल्पना करना मुश्किल नही कि अन्य मुश्किल हालातों में उसकी भूमिका क्या रहेगी?

अश्वनी राघव “रामेन्दु”

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