“हर मन मरीचिका हर जन मरीचिका”

हर मन मरीचिका, हर जन मरीचिका!!!!

नागालैंड के दीमापुर से उत्तरप्रदेश के आगरा तक एक महिला अपने बच्चों के साथ सिर्फ इसीलिये चली आई क्योंकि उसे महाजन से लिये दो हज़ार रुपये का क़र्ज़ चुकाना था जो उसने अपने दिवंगत पति के अंतिम संस्कार के लिये लिया था।उसे अपने बेटे की आज़ादी चाहिए जिसे महाजन ने क़र्ज़ की एवज में बंधुआ बना रखा है।पैसा जमा करने के लिये वह अपने बच्चों को सड़क पर पड़ी जूठन खिलाने में भी संकोच नहीं करती क्योंकि उसकी आँखों में मात्र अपने बेटे की आज़ादी का संकल्प है।



कई लोगो को शायद इस घटना पर विश्वास न हो क्योंकि उन्होंने सिर्फ नेताओ और मीडिया द्वारा दिखाई मजबूत और विकसित इंडिया की छद्म तस्वीर ही देखी है। गरीब-मजदूरों, छोटे किसानो और कमजोर तबकों वाला असली भारत नहीं देखा जिनकी पहली और आखिरी प्राथमिकता अपना और अपने परिवार का पेट पालना ही रहती है।वहाँ कोई हिन्दू और कोई मुस्लिम नहीं होता।दो जून की रोटी ही उनका धर्म और मजहब होती है।

प्रियंका चोपड़ा के गाउन को बेशक लोगो ने मीडिया में बहुत देखा होगा पर सड़को पर बलत्कृत होती महिलाओं की खबरें मीडिया में ज्यादा नहीं देखी होंगी चाहे वह खबर रोहतक की हो, गुरुग्राम की हो या भोपाल की । “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा लगता है बस टीवी और अखबारो के विज्ञापनों के लिये ही था जिससे इंडियंस को लगे कि देश की महिला अब रात को भी आज़ादी से सुरक्षित घूम सकती है।देश जो बदल रहा है।

कपिल मिश्रा मीडिया में ऐसे छाए हैं जैसे देश की राजनीति उन्ही के इर्द-गिर्द घूमती हो।नेता भी धड़ाधड़ बयानबाज़ी कर रहे हैं पर उस समय यही नेता मौनी बाबा बने बैठे थे जब तमिलनाड़ु के किसान हफ़्तों तक नंगे अपने मृत सम्बन्धियों के नरमुंडों के साथ जन्तर मन्तर पर प्रदर्शन कर रहे थे।उन्हें शायद वो भारत के नहीं लगे।वो शायद किसी और देश के थे।

देश के लिये शहीद होने वाले सैनिक के परिवार को जब योगी जी सहायता राशि देने जाते हैं तो प्रशासन वहाँ एसी,पर्दे,कालीन और तौलिये पहुंचा देता है ताकि उन्हें असली भारत न दिख जाये।अजीब विडंबना है जिन जवानो के सुख-दुःख में सारा देश शरीक होता है उन्हें सरकार न ढंग का खाना दे पा रही है न शहीद का दर्ज़ा।क्या फर्क पड़ता है कि तेईस महीने से ये सैनिक जन्तर- मन्तर पर धरना दे रहे हैं। वो अलग बात है राजनेताओ ने सेना के नाम पर देश की भावुक जनता को और भावुक कर वोट खींचना सीख लिया है।

पिछले कुछ वर्षो से बेरोजगारी अपने चरम पर है पर आज का युवा अब आंदोलन नहीं करता क्योंकि उसके पास समय नहीं है इंटरनेट जो मुफ़्त है।आंदोलन करना अब गए ज़माने की बात है अब वो परम्परा नहीं रही।अब आन्दोलन कर कोई देशद्रोही नहीं बनना चाहता।वैसे अपनी भड़ास युवा कहीं न कहीं निकाल लेते हैं कहीं गौरक्षक बनकर, कहीं दूसरे मत के छात्रो को पीटकर, कहीं पत्थर फेंककर।

लोग अरबो रुपया लेकर देश से भाग रहे हैं और मनरेगा मजदूरों की दिहाड़ी में एक रुपये का इजाफ़ा कर सरकार इतरा रही है।कहीं खाने की कमी के चलते  बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं और कहीं पर करोडो की सब्सिडी देकर योगा केंद्र खोले जा रहे हैं जिससे मोटापा कम हो सके।महंगाई पर देशव्यापी आंदोलन करने वाला विपक्ष सत्ता में आते ही महंगाई को विकास का सूचक बताने लगता है।तेल महँगा, पेट्रोल महँगा, रेल महँगी, अनाज महँगा।गरीब- किसानो की जान के अलावा सब ने अपनी कीमतें बड़ाई हैं चाहे नेता हो या अभिनेता।

अभी हाल ही मैं बाल्मीकि समाज के पचास लोगो ने सहारनपुर में हुई हिंसा और सरकार के पक्षपातपूर्ण रवैये से व्यथित होकर इस्लाम कबूलने की बात कही। हिन्दू-राष्ट्र की धारणा को धारण करने वाले महापुरुषों को ये भी स्पष्ट कर लेना चाहिए कि इस राष्ट्र में दलित भी हैं या नहीं।वैसे तो दक्षिणपंथी विचारक गोविंदाचार्य भी कह रहे हैं कि गाय का कारोबार करने वाले अस्सी प्रतिशत हिन्दू हैं वो अलग बात है वो पिटते नहीं हैं।

गरीब और गरीब,अमीर और अमीर बस यही एक सत्य है। विकास और समृद्धि केवल अमीरो के हिस्से में आ रही हैं।गरीब पहले की तरह आटे-दाल के जुगाड़ में अपना जीवन निकाल देता है।हमेशा की तरह सत्ता  केवल अमीरो की तस्वीरें दिखाकर विकास की छद्म तस्वीर  पेश करती रहती है और विशेष महारत वाली मीडिया ऐसा माहौल बना देती है कि उसकी चकाचौंध में सब खो जाता है सब कुछ।

अश्वनी राघव “रामेन्दु”



मरीचिका  (Mirage) – means something that is believed to be true or real but that is actually false or unreal.


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2 thoughts on ““हर मन मरीचिका हर जन मरीचिका”

  1. अश्विनी जी
    नमस्ते
    आपने ज्वलन्त प्रश्न उठा कर समाज को आइना दिखाया है !

    Liked by 1 person

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