भीड़ का आतंक !!!

भीड़ का आतंक…

पिछले कुछ दिनों से अखबारों, टीवी चैनलो और सोशल मीडिया में ख़ून से लथपथ उन लोगो की तस्वीरें आम हैं जो हिंसक भीड़ से अपनी जान की भीख़ माँगते नज़र आते हैं। इन तस्वीरों को देखकर निश्चित ही आपका हृदय भी थोड़ी देर के लिये विचलित होता होगा और मस्तिष्क में ये प्रश्न भी उठता होगा कि क्या यही वो समाज है जो हम अपनी अगली पीढ़ियों को देने जा रहे हैं।भारतीय संस्कृति अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति के लिये जानी जाती रही है जहाँ सभी धर्मो, जातियों,पंथो और विचारधाराओं के लिए बराबर जगह है।इस विषय पर गंभीर चिंतन किये जाने की आवश्यकता है कि ‘क्यों हमारा समाज इतना परस्पर विरोधी और हिंसक होता जा रहा है कि इंसान की जान लेने से भी नहीं चूकता?’

पिछले दिनों जमशेदपुर में उन्मादी भीड़ ने पुलिस के सामने ही सात निर्दोष लोगो की पीट-पीट के हत्या कर दी। ख़ून से सने पीड़ित और उनके परिवार वाले जान बख्शने की भीख़ माँगते रहे पर किसी का दिल नहीं पसीजा। चाहे सहारनपुर हिंसा हो, दादरी काण्ड हो या पहलू खान की हत्या इस उन्मादी भीड़ के आगे किसी की नहीं चली।

राजनीति से प्रेरित कुछ कट्टरपंथी संगठन अपनी विचारधाराओं को कानून से बड़ा होने का तर्क देते हुए स्वयं ही हिंसा का सहारा लेकर न्याय करना अपना अधिकार समझने लगे हैं। गौरक्षकों द्वारा की गई निर्दोष लोगो की हत्याओं के पीछे यही सोच काम करती है। ये बात भी सोलह आने सही है कि बिना राजनैतिक सरंक्षण के ये सब संभव नहीं। उत्तरप्रदेश पुलिस द्वारा एंटी-रोमियो स्क्वाड बनाये जाने की घोषणा के बाद ऐसे कट्टरवादी संगठनो से जुड़े लोगो की भीड़ डंडे के सहारे जनता को नैतिकता की सीख देते नज़र आ जाती है। राजनीतिक पार्टियों से जुड़े छात्र संगठनो द्वारा भी भीड़ को ढाल बना अपने विरोधियों के साथ हिंसा करने की घटनाएं पिछले कुछ दिनों सुर्खियाँ में रहीं, चाहे वह दिल्ली विश्विद्यालय हो या हैदराबाद विश्विद्यालय। न्यायालयों के बाहर वकीलो के समूह भी ऐसी वारदातों को अंजाम देने में पीछे नहीं रहते जिससे ये साबित होता है कि ऐसी घटनाओं के मूल में सिर्फ अशिक्षा और अज्ञानता नही है।

ऐसा नहीं है कि भीड़ द्वारा की गई हिंसा के पीछे केवल धार्मिक, जातिगत और राजनीतिक कारण ही होते हैं। कई बार भीड़ द्वारा की गई हिंसा के पीछे का मूल कारण सरकार और कानून के प्रति अविश्वास और न्याय न मिलने की पूर्वधारणा है जो लंबे समय के अनुभवों के बाद लोगो ने अपने मस्तिष्क में बना ली है। सड़को पर हुए मामूली से झगडे में लोगो की हत्याएं कर दी जाती हैं। खुद सजा देने की मानसिकता के पीछे कानून पर अविश्वास ही होता है यही सोच किसी को कानून के हवाले करने की बजाए उसे खुद सजा देने की मानसिकता को प्रेरित करती है।कई बार तो पुलिस-प्रशासन ही भीड़ की हिंसा का शिकार हो जाता है। भीड़ को कोई नहीं पहचान पाता क्योंकि इसका कोई चेहरा,जाति या धर्म नहीं होता बस हिंसा होती है जो कभी नहीं पसीजती।

उन्मादी भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसक घटनाओं के पीछे प्रशासन के प्रति अविश्वास के अलावा भी कई महत्वपूर्ण कारण होते हैं। भीड़ द्वारा की गई हिंसा के पीछे किसी न किसी अफवाह का अहम् किरदार होता है जो फैलते फैलते इतना व्यापक हो जाता है कि उसके सामने कोई तर्क काम नहीं करता। कई बार ये अफवाहें राजनीतिक लाभ के लिये जान बूझकर भी फैलाईं जाती हैं। आज के दौर में सोशल मीडिया अफवाह फ़ैलाने का सबसे कारगर साधन हैं जिसका भरपूर प्रयोग ऐसी घटनाओं में किया जाता है। जरुरी नहीं कि इस भीड़ का कोई नेता हो एक दूसरे की देखा-देखी भी लोग अपराध में शामिल हो जाते हैं।भीड़ का न्याय वाली मानसिकता ही दंगो के पीछे का मुख़्य कारण होती है क्योंकि लोगो के मन में ये धारणा होती है कि भीड़ का कोई अपराध नही होता। भीड़ में न पहचाने जाने और सजा न मिल पाने के चलते भविष्य में भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति की सम्भावना बनी रहती है। 

नशाखोरी और बेरोजगारी के चँगुल में फँसे युवा भी अपना गुस्सा और कुण्ठा इन हिंसक घटनाओं में शामिल होकर निकालते हैं। समूह में होने से लोगो का सोचने और व्यवहार करने का तरीका बदल जाता है।भीड़ भयानक रूप ले लेती है क्योंकि इसका विस्तार भेड़चाल की मानसिकता पर होता है। लोग समूह के साथ मिलकर की गई हिंसा के लिए खुद को जिम्मेदार नहीं मानते। भीड़ की आक्रामक उत्तेजना में लोग अपनी निजी नैतिक मान्यताएँ भुलाकर उनके विपरीत व्यवहार करने लगते हैं। कई बार तो बस वह दूसरों की वाह-वाही लूटने और  रोमांच का अनुभव मात्र करने के लिए हिंसक हमलो में शामिल हो जाते हैं। 

हमारे युवा उन्मादी भीड़ में तब्दील हो रहे हैं उनके पास समस्याओं पर निष्पक्षता से विचार करने का समय नही है।उनके पास किसी से सवाल पूँछने का समय नही है। उन्हें बस हिंसा करने की जल्दी है क्योंकि उनके मस्तिष्क में ऐसे ही विचारों का रोपण किया जा रहा है। चौबीस घंटे सोशल मीडिया पर वो देशद्रोही, दलाल, बदला, सिर के बदले सिर, गद्दार शब्द देखता और पढ़ता है जो उसके चारो तरफ एक ऐसा आवरण बना देते हैं जिसमे सिर्फ हिंसा,  पत्थरबाजी, गाली-गलौज के लिए ही जगह है। उसे कभी किसी को देशद्रोही कहने की जल्दी है, कभी विपरीत विचारधाराओं की महिलाओं को वेश्या कहने की जल्दी है तो कभी दूसरो को दोषी साबित करने की जल्दी है। सबको न्याय स्वयं करना है दूसरे का पक्ष सुने बिना।

भीड़ द्वारा की गई घटनाओं का प्रभाव  बेहद दूरगामी, व्यापक और नकारात्मक होता है। पीडितो और दोषियों में तो दुश्मनी होती ही है पूरे समाज में भी तनाव और भय का माहौल बन जाता है जिसे सामान्य होने में वर्षों लग जाते हैं। इसके अलावा ऐसी घटनाओं का राजनीतिक लाभ लेने के लिए अक़सर इन्हें किसी धर्म या जाति के साथ जोड़ दिया जाता है और पेशेवर तरीके से सोशल मीडिया पर प्रचारित किया जाता है। जिससे धर्मो और जातियों में परस्पर वैमनस्य और असुरक्षा का माहौल बनता है जिसका परिणाम एक अन्य हिंसक घटना के रूप में निकलता है। ये तनावपूर्ण माहौल केवल एक क्षेत्र विशेष तक सीमित नही रहता अपितु अन्य राज्यों तक इसका असर होता है। कट्टरवादी संगठन बार बार पीडितो और हिंसा की तस्वीरें लोगो को दिखाकर आक्रामक होने के लिए प्रेरित करते रहते हैं जिससे लोगो की लाश पर ही सही इनकी दुकानदारी चलती रहती है।

कानून की परवाह किये बिना भीड़ की खुद सजा देने की मानसिकता की पूरी जिम्मेदारी सरकार और कानून की है। पुलिस भीड़ द्वारा किये जाने वाली हिंसा को मात्र एक सामाजिक प्रक्रिया मान मूक दर्शक बने रहती है। जबकि भीड़ द्वारा की गई हिंसा को अपराध की नज़र से देखे जाने की जरुरत है जिसे रोकने की जिम्मेदारी नेताओ, मीडिया, पुलिस और सामाजिक संस्थाओ को मिलकर उठानी होगी। प्रशासन और पुलिस के प्रति लोगो के मन में व्याप्त अविश्वास को दूर करना होगा जिससे जनता खुद सजा न देकर कानून व्यवस्था पर भरोसा करे। भीड़ द्वारा की गई हिंसा की वारदातों में शामिल लोगो को शीघ्र सजा देकर ये सन्देश देना भी जरुरी है कि भीड़ में छुपकर कोई सजा से नहीं बच सकता। राजनैतिक इच्छाशक्ति के बिना उन्मादी भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसक घटनाओं पर लग़ाम लगाना असंभव है पर धर्म, जाति और वोटबैंक पर आधारित तुष्टिकरण की राजनीति के चलते राजनैतिक दलों से ये उम्मीद करना महज एक स्वप्न ही प्रतीत होता है।

अश्वनी राघव “रामेन्दु”
26/05/2017


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4 thoughts on “भीड़ का आतंक !!!

  1. आपने महत्वपुर्ण विषय पर चर्चा की है. भीड़ का व्यवहार अक्सर उन्माद में बदल जाता है और यह उन्मादी भीड़ सही गलत भूल जाती है.

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