बरसात मेरे शहर में !!


“बरसात मेरे शहर में”



फिर जमा हो गए

बरसाती बादल

बरसेंगे तो जरूर

हर साल जो बरसते हैं

फिर ब्रह्माण्ड में लीन हो जायेंगी

दबी जुबान से की गई वो

बरसात न होने की प्रार्थनाएँ ।


फिर टपकेंगी कमजोर छतें

और गिरेंगे पुराने पुश्तैनी घर

नालियोँ का वो जलप्रवाह

एक बार फिर मिटा देगा

घर और सड़क के अन्तर को।


मजदूर औरतें

अपने बड़े सर वाले बच्चे

बगल में दबाए, जमा करेंगी

चीथड़े, डब्बे और कनस्तर,

शहर की हालत कुछ

उस बुद्धिजीवी सी होगी

जो जिन्दा तो है, 

पर पता नही

क्यों और कैसे ??


अश्वनी राघव “रामेन्दु”

(“बरसात मेरे शहर में ” कविता आज से लगभग दस साल पहले मैंने लिखी थी। बरसात के मौसम में फिर से सामने आ गई तो आप सबको सुनाने का मन कर गया। थोड़े बदलाव किये हैं जो समय की माँग भी है।)

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10 thoughts on “बरसात मेरे शहर में !!

  1. BAHUT BADHIYAA LIKHAA SIR…..

    TERE BEEN BARIS MAUT HAMAARE,
    AAYE TUM TO MAUT HAMAARE,
    TUM BIN MARGHAT SI HAI DHARTI,
    AATE HI SHAMSHAAN BANAATE,
    BIN BAARIS KE JEE NAHI SAKTE
    AATE HO PHIR JEE NAHI SAKTE
    MERE DARD KO KAUN SUNEGAA,
    APNE GHAR MEN BANE BEGAANE.

    Liked by 1 person

  2. बरसात का सौंदर्य अपनी जगह पर है. पर यह वर्षा का सही -वास्तविक चित्रण है.

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