फ़िर हो वेतन-निर्धारण !!

फ़िर हो वेतन-निर्धारण !!!

पिछले दिनों मीडिया में ये खबर चली कि केन्द्र सरकार जल्दी ही “सार्वजनीन न्यूनतम वेतन” नीति बनाने जा रही है। इस खबर से केन्द्रीय परियोजनाओं में कार्य कर लाखो संविदाकर्मियों में एक आस बँधी कि शायद अब उन्हें भी एक सम्मानजनक वेतन मिल पाएगा और वेतन-निर्धारण में हुई चूक अब सुधार ली जाएँगी। अभी तो ये हाल है कि अलग अलग परियोजनाओं में समान पद पर कार्य कर रहे संविदाकर्मियों में तो अन्तर है ही बल्कि एक ही परियोजना में समान पद पर कार्य कर रहे संविदाकर्मियों के वेतन में भी बड़ा अन्तर है। उदाहरण के लिये किसी परियोजना की राष्ट्रीय स्तर की इकाई में कार्यरत वाहन-चालक का वेतन राज्य स्तर के वाहन-चालक से अधिक है और राज्य स्तर वाले वाहन-चालक का वेतन जिलास्तर की इकाई में कार्यरत वाहन चालक से ज्यादा है। स्नातक तक की पढ़ाई किये हुए कर्मी का वेतन भी इसी प्रकार तय किया गया है। स्थिति ये है कि समान शैक्षणिक योग्यता वाले पदों के वेतन में भी कई गुना अन्तर है। प्रश्न ये उठता है कि जब कार्य की प्रकृति और शैक्षणिक योग्यता समान है तो वेतन में अन्तर क्यों?

कर्मियों में आस बँधी थी कि नयी नीति से वेतन में असमानता और विसंगतियों से निजात मिलेगी और नए वेतन- निर्धारण में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों और बढ़ती महंगाई का भी ध्यान रखा जाएगा जिससे संविदाकर्मियों को भी एक सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिल सके पर अरुण जेटली के उस बयान ने लाखो संविदाकर्मियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया जिसमे उन्होंने कहा कि सार्वजनीन न्यूनतम आय (यूबीआई) का विकल्प व्यवहारिक नीतिगत विकल्प नही है।

भारत सरकार की केंद्रीय परियोजनाओं में लम्बे समय से कार्य कर रहे लाखो संविदाकर्मी अपनी “समान कार्य के लिये समान वेतन’ की माँग को अनदेखा किये जाने से खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। एड्स और टीबी जैसी भयंकर बीमारी से लोगो को बचाने में लगे केंद्रीय परियोजनाओं के कर्मचारी आज भी दिल्ली सरकार द्वारा तय किये गए न्यूनतम मासिक वेतन से कम वेतन में कार्य करने को मजबूर हैं जबकि इनकी शैक्षणिक योग्यता और अनुभव किसी भी पायदान के कार्यरत नियमित कर्मचारियों से दोयम नहीं है।

दुर्भाग्य की बात है कि हमेशा संक्रमण के ख़तरे से जूझते इन संविदाकर्मियों और इनके परिवार को किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य या अन्य सामाजिक सुरक्षा प्राप्त नहीं है। संविदा पर कर्मचारी नियुक्त करने के शुरआती दौर में इन कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों की तुलना में अधिक वेतन मिलता था जो सरकारो की इच्छाशक्ति और असंवेदनशीलता के चलते वर्तमान में इनसे आधे से भी कम हो गया है। बढ़ती महँगाई, बेरोजगारी और नौकरी जाने के भय से ये वर्ग काफ़ी समय से हो रहे शोषण को सहता आया है। अब इस वर्ग में लम्बे समय से सरकार द्वारा किये जा रहे भेदभाव पूर्ण रैवैये के ख़िलाफ़ भारी रोष है।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने एक फैसले में इन संविदाकर्मियों को “समान कार्य के लिये समान वेतन” का हकदार माना है। इस फैसले में माननीय न्यायालय ने सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकार-1996 के अंतराष्ट्रीय समझौते का हवाला देते हुए कहा है कि समान कार्य के लिये समान वेतन प्रत्येक नागरिक का हक़ है और कोई भी इन्हें इस हक़ से वंचित नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि समान वेतन न देना अमानवीय, शोषण और दमनकारी है।अपने परिवार की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिये इन्हें कम वेतन पर कार्य करने के लिये मजबूर होना पड़ता है और अपना आत्मसम्मान और गरिमा दाँव पर लगानी पड़ती है। सरकारों का संविदाकर्मियों को नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन न देना या इसके लिये कठिन मापदण्ड बनाना एक गलत परम्परा है जिसे बदलना होगा। वहीँ दूसरी ओर सातवें वेतन आयोग ने भी संविदाकर्मियों के लिये एक यूनिफार्म नीति बनाने की सिफारिश केंद्र सरकार से की है जिससे इन कर्मचारियों के अनुभव और योग्यता के आधार पर पूरे देश में एक समान वेतन की नीति निर्धारित की जा सके।

कम वेतन और बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के अपनी जिम्मेदारियों को मुस्तैदी से निभाते संविदाकर्मियों के मुद्दे सरकारी नीतियों के अभाव के चलते वर्षो से लंबित हैं। फण्ड की कमी,केंद्र और राज्य सरकारो के बीच आपसी समन्वय के अभाव और अन्य कारणों का बहाना बनाकर इस गम्भीर मुद्दे को पिछली सरकारो द्वारा हमेशा ठन्डे बस्ते में डाला जाता रहा है जिससे कर्मचारियों में सरकार के प्रति अविश्वनियता बड़ी है। केन्द्र सरकार को चाहिए कि संविदाकर्मियों की जायज़ माँगो को पूरा करने के लिये तुरन्त नीतिगत सुधार करे जिससे इनके साथ लम्बे समय से हो रहा भेदभाव दूर हो सके।

अश्वनी राघव “रामेन्दु”

20/06/2017

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