मैं ग़रीब हूँ !!!

मैं ग़रीब हूँ !!!

जब भी आप शंका में हों तो उस गरीब और निर्बल का चेहरा याद करें जो आपने देखा हो और फ़िर खुद से पूँछे कि आप जो कार्य करने जा रहे हैं उससे उस गरीब व्यक्ति को लाभ होगा कि नहीं” गाँधी जी द्वारा शासकवर्ग और अफसरशाही को दिये गए इस सरल मन्त्र को हम सभी ने पढ़ा है पर विडंबना ही है कि गाँधी जी पर अपना हक़ जताने के लिये तो सभी राजनीतिक दल कोशिश करते हैं पर उनके बताये रास्ते पर चलने से सभी को परहेज है। गरीबवर्ग के प्रति संवेदनशील होना तो दूर की बात है सत्ता और  प्रशासन ने आजकल गरीबो को उपहास का पात्र बना दिया है।

हाल की ही घटना में राजस्थान के दौसा जिले में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत राशन लेने वाले हर घर के बाहर स्थानीय प्रशासन ने “मैं गरीब हूँ” लिखवा दिया। विरोध करने वाले लोगो को राशन बन्द करने की धमकी भी स्थानीय प्रशासन द्वारा दी गई। हालाँकि मन्त्री महोदय द्वारा ऐसे किसी भी आदेश को दिये जाने का खंडन किया गया है पर बड़े पैमाने पर की इस कार्यवाही की जानकारी अफसरशाहों और नेताओं को न हो ये मुमकिन नही है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने से पहले स्थानीय प्रशासन द्वारा लोगो को साबुन बाँट कर नहा कर आने की हिदायत देने की खबर भी पिछले दिनों ख़ूब चर्चा में रही।

कोई भी संवेदनशील व्यक्ति या अफसर किसी भी नागरिक का अपमान नही करेगा चाहे वह गरीब हो या अमीर। जिन लोगो पर समाज के कमजोर और गरीब तबके के उत्थान की जिम्मेदारी है उनका गरीबो के प्रति इतना संवेदनहीन होना सरकार और अफसरशाही की गरीबो के प्रति उनकी मानसिकता पर गम्भीर सवाल खड़ा करता है। होना तो ये चाहिये कि भ्रष्ट नेताओं और अफसरों की सूची जनता के सामने लाई जाये। बड़े- बड़े बैंक डिफॉल्टर्स की सूची सार्वजनिक की जाये पर ऐसा नहीं होता। काले-धन का अम्बार लगाये लोगो का नाम सरकार सार्वजनिक नहीं करना चाहती पर गरीब नागरिकों का मजाक उड़ाने में उसे कोई संकोच नही है। नेताओं द्वारा किसान आत्महत्याओं  के पीछे प्रेम-प्रसंग कारण बताया जाना किस जिम्मेदार नागरिक के दिल में रोष उत्पन्न नही करेगा? सवाल ये उठता है कि क्या गरीब, किसान और मजदूर भारतीय नागरिक नहीं हैं? क्या संविधान उन्हें सम्मान के साथ जीने का अधिकार नहीं देता? अगर देता है तो उन नेताओं और अफसरशाहों के खिलाफ कार्यवाही क्यों नही होती जो इनके प्रति इतने संवेदनहीन हैं?

भारत में विश्व के एक तिहाई गरीब लोग रहते हैं देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा गरीबी रेखा से नीचे रहता है। दरअसल यहीअसली भारत है जिसके मेहनत के बल पर हम देश के विकास की आधारशिला रखते हैं पर सरकारी नीतियों और कार्यशैली में इन्ही लोगो को दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाना दुख़द है। सरकारें बड़े बड़े विज्ञापन देकर देश के विकसित होने का छद्म माहौल तो तैयार कर लेतीं हैं पर ये भूल जाती हैं कि इन विज्ञापनों से  गरीब, मजदूरो और किसानों के परिवारों का पेट नहीं भरता।

मुट्ठी भर लोग देश की पूँजी के बहुत बड़े हिस्से के मालिक हैं जो उन्होंने इन्ही गरीब मजदूरों के बल पर कमाया है। गरीब और अमीर के बीच लगातार बढ़ती इस खाई को पाटना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए जिसके लिये ऐसी योजनाओं को अमल में लाना चाहिए जो कमजोर तबके को सम्मान के साथ स्वावलंबी बना सके। कोई गरीब खैरात नहीं चाहता। अगर उसे रोजगार मिले, मेहनत का पूरा दाम मिले तो उसे किसी सरकारी सहायता का मुँह ताकने की जरुरत नहीं हैं पर सरकारों की असफलताओं ने उन्हें इसके लिये मजबूर कर दिया है। देने और लेने के इस क्रम में देने वाला लेने वाले का अपमान करना अपना अधिकार समझने लगता है। अहंकार में चूर इन अधिकारियों को ये समझना चाहिए कि उनका काम केवल जनता के पैसे को जनता तक पहुँचाना होता है वो साधनों के मालिक नहीं हैं।

अश्वनी राघव “रामेन्दु”

29/06/2017



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17 thoughts on “मैं ग़रीब हूँ !!!

  1. बहुत खूब—-गरीब इंसान ही नही होता, खेद इसी बात का है कि कब इसे लोग इंसान समझेंगे।भगवान राम की पूजा करते हैं हम और हममे से अनगिनत ऐसे हैं जो —सेवरी और निषादराज को भूल खुद को भगवान से श्रेष्ठ बना लेते हैं।

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    1. मेरे मत में दोनों एक दूसरे के पूरक है जो सदियों से हैं सदियों तक रहेंगे—लड़ाई सिर्फ हक की है—–जो गरीब ही अमीर का साथ पाकर अमीरों की श्रेणी में आते ही हक पर कब्जा जमा लेते हैं।ये मेरा मत है।

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      1. कमज़ोर और गरीब तबके के प्रति सरकार की संवेदनशीलता का ख़त्म होना एक गंभीर समस्या है। असली भारत अभी भी गरीब और लाचार है पर इसे झूठी चकाचोंध से छुपाने का प्रयास सरकारो द्वारा किया जा रहा है।हमें इसका विरोध करना चाहिए।

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      2. बिल्कुल ठीक कहा आपने।जिस देश मे 10,000 रुपये प्रति माह की नौकरी के लिए लोग सड़कों पर लाईन लगा खड़े हैं वहां किसी की तनख्वाह में इजाफा पर इजाफा–जेब मे पैसे नही जेनेरल बोगी में चढ़ने को वहां बुलेट ट्रेन के ख्वाब।ठीक है मगर किसके लिए।गरीब का पेट खाली फिर भी होठों पर मुश्कान शायद देश विकास कर रहा है।

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  2. प्रशंषनीय लेख समाज का असली चेहरा सामने लाने के लिए सच्चाई और बदलाव का जज्बा होना चाहिए। प्रस्तुतिकरण बहुत बढिया और सबसे बड़ी बात लेख के माध्यम से समाज का वास्तविक चेहरा दिखाया गया।गरीब और ऊसकी गरीबी वर्षों से उपहास का दंश झेल रहे हैं।

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      1. बहुत आभार आपका 🙏सामाजिक सारोकार से जुड़े हुए लेख और रचनाएं हर कोई नहीं लिखता, वही लिखता है जो इस प्रकार के विषयों के लिए संवेदनशील होता है औऱ सोचता है के दबे कुचले लोगों की बात भी मुख्य धारा तक पहुंचे और सामाजिक विसंगतियों का निवारण हो।

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      2. सही कहा आपने। मैं रोज़ नहीं लिख पाता, अपनी अपनी व्यस्तताएं हैं पर अगर गरीब ,कमजोर या किसी के साथ कुछ भी गलत हो रहा हो तो खुद को लिखने से रोक भी नहीं पाता।

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      3. बहुत अच्छे विचार……वैसे भी मुझे लगता है अगर वास्तव में किसी व्यक्ति में साहित्यिक गुण हैं तो निश्चित ही वह हृदय से संवेदनशील है।

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      4. जी बिल्कुल सही बात है।अच्छा लगा आपके विचार जानकर। विचारो के आदान-प्रदान से ही हमारी सोच बढ़ती है, बदलती है।

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