खबरों से ग़ायब असम की बाढ़ !!


खबरों से ग़ायब असम की बाढ़ !!


हर साल की तरह इस साल भी ब्रह्मपुत्र नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। भारी बारिश के चलते जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। लाखो लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। किसानो की फसलें और मकान सब बाढ की चपेट में आ गए हैं जिससे उन्हें भूख, बीमारी और अन्य समस्याओ का सामना करना पड़ रहा है। बाढ़ के चलते लगभग पच्चीस नागरिको की जान जा चुकी है और चार लाख लोग इससे प्रभावित हुए हैं पर हैरत की बात है कि प्रमुख अख़बार या टीवी चैनलों ने इस आपदा से प्रभावित लोगो की पीड़ा को प्रमुखता से दिखाना मुनासिब नहीं समझा है। 

राजनीतिक छींटा-कशी, साजिश, अपराध, और फैशन की खबरों से पटे मीडिया में क्यों आम लोगो से जुडी समस्या को स्थान नहीं मिल पा रहा है ये एक गंभीर प्रश्न है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया से आम लोगो उम्मीद रहती है कि मीडिया उनकी बात सरकार तक पहुंचाएंगी पर आजकल मीडिया में भी व्यावसायिक लाभ की खबरों को ही महत्ता दी जा रही है। ये सिर्फ इस वर्ष की स्थिति नहीं है पिछले वर्ष भी असम में आई भीषण बाढ़ को मीडिया में उतना स्थान नहीं मिला था जितना मिलना चाहिए था। उत्तर-पूर्व राज्यों से जुडी खबरो को बस एक छोटे से कॉलम में सीमित कर दिया जाना अब परम्परा बन गई है।


उत्तर-पूर्व की खबरों को नज़रअंदाज़ केवल मीडिया ही नहीं करती बल्कि सरकार और उसके नेता भी वहाँ के मुद्दों पर उतना गम्भीर नज़र नहीं आते। हाल ही में एक बीजेपी नेता द्वारा दिया गया बयान उनकी मानसिकता को दर्शाता है कि जिसमे उन्होंने कहा था कि दक्षिण भारत के लोग भी तो उनके साथ रहते हैं। जब दक्षिण भारत के राज्यों और लोगो के प्रति नेताओ की ये धारणा है तो उत्तर-पूर्व के राज्य तो शुरू से ही नज़रअंदाज़ होते आएं हैं।

व्यावसायिकता के इस समय में मीडिया व पत्रकारिता  मात्र एक व्यवसाय बन कर रह गई है। आजकल वही ख़बरे प्रमुखता से छपती हैं जिन्हें छापने से उनकी स्वार्थसिद्धि होती है। सत्ता का गुणगान करना ही उन्हें अपनी स्वार्थसिद्धि का सबसे आसान तरीका लगता है जिसका वो पूरा मूल्य भी पाते हैं। हमेशा की तरह इसका खामियाजा सिर्फ जनता को ही भुगतना पड़ता है एक तरफ तो उनकी पीड़ा को दर्शाने का कोई माध्यम नहीं मिलता दूसरी और सत्ता और बिकाऊ मीडिया का गठजोड़ ख़बरो को अपने स्वार्थ के अनुसार प्रयोग करता है।
असम में आई भीषण बाढ़ की खबर को प्रमुखता से न छापे जाने के पीछे भी पत्रकारिता का व्यवसायीकरण और राजनेताओं की जनता से जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनहीनता ही है। 

अश्वनी राघव “रामेन्दु”

07/07/2017


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14 thoughts on “खबरों से ग़ायब असम की बाढ़ !!

  1. सारे के सारे चैनल या पत्रकारिता लोकप्रियता के
    रफ्तार मे गाफिल है
    आफत या आपदा उन्हे झलकती है जब पानी सिर के ऊपर होता है
    बहुत अच्छे विषय को आपने तरजीह दी है
    और ध्यान मे मिडिया के लाने का प्रयास किया है

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    1. शुक्रिया नागेश्वर सिंह जी। आपने एकदम सही कहा जब आफत सिर पर आती है तभी नींद से जागती है सरकार और मीडिया

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