विज्ञान बनाम एजेंडा !!

विज्ञान बनाम एजेंडा !!

कल्पना कीजिये कि आप किसी अस्पताल में अपने सगे-सम्बन्धी का ईलाज करने जाते हैं और आपको पता लगता है कि अस्पताल के सभी चिकित्सक मरीज़ों को उनके हाल पर छोड़ पूजा- पाठ करने में व्यस्त हैं तो आपको कैसा लगेगा?? जी हाँ ऐसा वास्तव में हो रहा है हैदराबाद के गाँधी अस्पताल में ऐसा ही कुछ चल रहा है ये अस्पताल तेलंगाना का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। यहाँ के वरिष्ठ चिकित्सक मातृ एवं शिशु मृत्युदर कम करने के लिये विज्ञानं पर भरोसा छोड़ पूजा-पाठ और कर्मकाण्ड का सहारा ले रहे हैं। दुःख की बात ये है कि जहाँ पढे-लिखे लोगो में ही वैज्ञानिक सोच का अभाव है वहाँ हम कैसे कल्पना कर सकते हैं कि विकास से मीलो दूर बैठा आम आदमी अंधविश्वास और रुढ़िवाद के मायाजाल से बाहर निकल पाएगा।

अभी कुछ दिनों पहले ही मध्यप्रदेश सरकार ने सरकारी अस्पतालों में ज्योतिषी नियुक्त करने का एलान किया जो मरीज़ की जन्म-कुंडली देखकर उसकी बीमारी बताएँगे और ईलाज भी करेंगे। सवाल ये हैं कि क्या इस फैसले का कोई वैज्ञानिक आधार है क्या ज्योतिष शास्त्र द्वारा रोग-निवारण पर शोध और प्रयोग विशेषज्ञों की देखरेख में किये गए हैं। अगर किये गएँ हैं तो उसका परिणाम और सफलता प्रतिशत कितना रहा इसको सार्वजनिक करने की जरुरत है। ऐसे शोध और प्रयोगों में कौन से मानकों को आधार बनाया गया है ये भी भी देखने का विषय है।

सभी परंपरागत विधाएं वैज्ञानिक नही है ये कहना भी गलत होगा पर उन्हें वर्तमान के वैज्ञानिक मापदंडो के अनुसार स्थापित करने की आवश्यकता है। जिसके लिए सरकार उन विषयों पर शोध को बढ़ावा दे सकती है और अन्तर्राष्ट्रीय मानकों पर उन्हें सही ठहराने के प्रयास कर सकती है। शोध, प्रयोग, आँकड़ो, परिणाम और सफलता प्रतिशत के आधार पर ही कोई पद्धति खुद को स्थापित कर सकती है। वैज्ञानिक आधार के अभाव में प्रश्न उठना लाज़िमी है क्योंकि प्रश्न करना ही विज्ञानं है।

केवल सरकार के एजेंडे को लागू करने के दवाब में सरकारें और संस्थाएं यदि रुढ़िवाद,मान्यताओं और अंधविश्वास को बढ़ावा देंगी तो वह राष्ट्रविरोधी होगा क्योंकि ऐसा करके वह राष्ट्रनिर्माण के लिए आवश्यक वैज्ञानिक सोच की हत्या कर रही हैं। सरकार को चिकित्सा संस्थानो में चिकित्सकों और पैरमेडिकल्स की कमी, जाँच व अन्य कमियों को पूरा करने पर ध्यान लगाना चाहिए न कि ऐसी बातो को बढ़ावा देना चाहिए। अगर सरकार ही ऐसे कदम उठाती हैं तो ऐसा प्रतीत होने लगता है कि वह मान चुकी है कि सभी नागरिको को बेहतर सुविधाएँ देना उसके बस की बात नहीं और पार्टी एजेंडा उनके लिए जनता की जिंदगी से ज्यादा जरुरी है। केवल स्वास्थ के क्षेत्र में ही नहीं शिक्षा के क्षेत्र में खासकर इतिहास में राजनीतिक दलों द्वारा अपने एजेंडा के अनुरूप बदलाव किये जा रहे हैं भले ही ये बदलाव सच्चाई से कोसों दूर हों।

ऐसा नहीं है कि कहीं कुछ अच्छा नहीं हो रहा है उदाहरण के लिए दिल्ली सरकार नागरिको को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य  सुविधाएँ मुहैया करवाने के लिये भरसक प्रयास कर रही है। चाहे वह मोहल्ला क्लिनिक हों, निशुल्क शल्य चिकित्सा हो या फिर सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का सुधरता स्तर हो। राजनीतिक एजेंडों और महत्वाकांक्षाओं से इतर ऐसे प्रयासों को सराहे जाने और इनसे कुछ सीखने की जरुरत है क्योंकि जब तक नागरिको को मूलभूत सुविधाएँ नहीं मिलेंगी तब तक राष्ट्र का विकास असंभव है।

अश्वनी राघव “रामेन्दु”
26/07/2017

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6 thoughts on “विज्ञान बनाम एजेंडा !!

  1. अध्यात्म को समझा जा सकता है परन्तु
    अस्पतालो मे ? ये समझ से परे है
    अच्छी रौशनी डाले है आप

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